छत्तीसगढ़ में दुर्लभ प्रतिमा को बेताल के रूप में पूजते हैं ग्रामीणUpdated: Fri, 05 Feb 2016 09:25 PM (IST)

ग्राम भाटागुड़ा में जैन धर्म के सोलहवें तीर्थंकर भगवान शांतिनाथ और देवी लक्ष्मी की दुर्लभ प्रतिमा इमली पेड़ के नीचे रखी है।

जगदलपुर। ग्राम भाटागुड़ा में जैन तीर्थंकर शांतिनाथ व लक्ष्मी की प्रतिमा।

हेमंत कश्यप, जगदलपुर। इंद्रावती नदी के किनारे ग्राम भाटागुड़ा में जैन धर्म के सोलहवें तीर्थंकर भगवान शांतिनाथ और देवी लक्ष्मी की दुर्लभ प्रतिमा इमली पेड़ के नीचे रखी है। मूर्तियों के मूल स्वरूप से अंजान ग्रामीण इन्हें बेताल और कोटगुड़िन देवी के रूप में पूजते हैं और हर तीसरे साल इनके सामने बलि देते हैं।

पिछले दस साल से ग्रामीण मूर्तियों को देवालय बनाकर सहेजना चाहते हैं परंतु इन्‍हें सरकारी मदद नहीं मिल रही है। यह मूर्तियां पुरातत्व विभाग के रिकार्ड में भी नहीं हैं। जैन धर्मानुयायी कहते हैं कि प्रतिमा के नीचे मृग अंकित है जिसके आधार पर इसे तीर्थंकर शांतिनाथ माना जा रहा है।

जिला मुख्यालय से सात किमी दूर भाटागुड़ा ग्राम पंचायत गरावंडकला का आश्रित ग्राम है। चार सौ की आबादी वाले भतरा आदिवासियों की इस बस्ती के पटेलपारा में इमली पेड़ के नीचे यह मूर्तियां रखी हुई हैं। करीब तीन फीट ऊंची भगवान शांतिनाथ की प्रतिमा ब्लैक ग्रेनाइट की है।

लगभग डेढ़ फीट उंची माता लक्ष्मी की प्रतिमा डिसार्ट स्टोन से निर्मित है। पटेल शोभाराम कश्यप बताते हैं कि सैकड़ों वर्षों से यह मूर्तियां खुले में पड़ी हैं। इनके प्रति ग्रामीणों में बड़ी आस्था है इसलिए हर तीन साल के अंतराल में बारिश के पूर्व यहां वार्षिक जात्रा कर दो बकरों की बलि दी जाती है।

नहीं मिली मदद

पंच श्रीमती सोनामनी मनकी और रामचंद बघेल बताते हैं कि वर्ष 2002 में गुड़ी मरम्मत के नाम पर 10 हजार रूपए मिला था जिससे मूर्तियों के चारों तरफ परकोटा बनाया गया था। वह अब जर्जर हो चुका है। ग्रामीण चाहते हैं कि बस्ती में विशाल मंदिर बने। इसके लिए ग्रामीणों ने श्रमदान भी किया था ताकि कालम खड़ा किया जा सके।

दुर्लभ है प्रतिमा

भाटागुड़ा की प्रतिमाएं दुर्लभ हैं। भगवान शांतिनाथ की ऐसी मूर्ति बस्तर में कहीं और नहीं है। इन मूर्तियों का कोई रिकार्ड विभाग के पास नहीं है। पहली बार प्रकाश में आई हैं।

एएल पैकरा, जिला संग्रहालयाध्यक्ष।

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