झाबुआ जिले में मुर्गी की मदद से मोर पाल रहे ग्रामीणUpdated: Sat, 25 Apr 2015 11:21 PM (IST)

इन दिनों झाबुआ ब्लॉक के कई आदिवासी अंचलों में राष्ट्रीय पक्षी मोर को संरक्षण देने के साथ ही उन्हें पालने का शौक देखा जा रहा है।

कुंवर निर्भयसिंह, पिटोल(झाबुआ)। इन दिनों झाबुआ ब्लॉक के कई आदिवासी अंचलों में राष्ट्रीय पक्षी मोर को संरक्षण देने के साथ ही उन्हें पालने का शौक देखा जा रहा है। क्षेत्र के कुंडला, मोद व कालिया आदि गावों में बड़ी संख्या में मोर विचरण करते हैं और उनकी आवाज सुनने को मिल जाती है।

पिटोल में भी एक आदिवासी परिवार नें मोरों को बसाने का अनुकरणीय प्रयास किया है। इसमें परिवार का हाथ बंटा रही है एक मुर्गी, जिसने अंडों से मोर के चूजे निकालने से लेकर मोरों को बड़ा करने में परिवार की पूरी मदद की।

मुर्गी ने सेहे मोर के अंडे

पिटोल में मोरों को पालकर उनकी देखरेख कर रहे बाबू पिता कसना बबेरिया ने बताया उसने समीप के गांव छालकिया से पांच मोर के अंडे लाकर घर पर मुर्गी के अंडों के साथ रख दिए। मुर्गी ने अपने अंडों के साथ मोर के अंडों को भी सेहे। लगभग सवा महीने में अंडों से मोर के बच्चे बाहर आ गए। मुर्गी ने अपने बच्चों के साथ उन्हें भी बड़ा कर लिया।

सुबह निकलकर शाम को घर आ जाते हैं

बाबूभाई ने बताया कि बचपन में मोरों की काफी देखरेख करना पड़ी। समय-समय पर दाना-पानी देना पड़ा। लेकिन अब तो वे सुबह घर से निकलकर घूमकर शाम को वापस घर आ जाते हैं। सुबह घर के बच्चों के हाथ से बिस्किट छीनकर खाना उनको एवं उनके परिवार के लोगों को बहुत लुभाता है। घर पर बने चावल ये बड़े चाव से खाते हैं। बाबूभाई ने बताया कि कुंडला एवं कालिया में अचानक मोरों की संख्या बढ़ी है। पहले झाबुआ ब्लॉक के इन गांवों में कभी मोर इतनी संख्या में नहीं देखे जाते थे।

असुरक्षित थे मोर

लगभग पांच वर्ष पूर्व भी आदिवासी अंचलों में यह राष्ट्रीय पक्षी असुरक्षित था। क्षेत्र के कतिपय आदिवासी चोरी छुपे इनका शिकार कर लेते थे, लेकिन अब इनके शिकार से परहेज करने लगे हैं। ऐसा करने वालों को गांव में दंडित किया जाता है। क्षेत्र का आदिवासी मोरों को पूरा संरक्षण देने लगा है। कारण ये है कि यह माना जाने लगा है कि इस पक्षी के गांव में रहने से सुख-शांति और समृद्धि आती है।

इच्छा थी, पूरी की

पिटोल में मोर बसाने की इच्छा मन में आई। इसलिए अंडे लाकर एक प्रयास किया। अब वे गांव में मोरों की और अधिक संख्या बड़े इसके लिए परिवार के साथ ही दोस्त यारों को प्रेरित करेंगे। मोरों को घर- आंगन में घूमते नाचते देख मन को सुकून मिलता है।

बाबू कसना बबेरिया, किसान पिटोल

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