ग्‍वालियर की विद्यार्थी ने चंबल की मिट्टी में खोजा हर्बल कलरUpdated: Thu, 20 Nov 2014 05:07 PM (IST)

डाकुओं के पसंदीदा क्षेत्र कहे जाने वाले बीहड़ अब लोगों को कलर्स की वजह से जन्म लेने वाली बीमारियों से बचाएंगे।

आनंद धाकड़, ग्‍वालियर। डाकुओं के पसंदीदा क्षेत्र कहे जाने वाले बीहड़ अब लोगों को कलर्स की वजह से जन्म लेने वाली बीमारियों से बचाएंगे। क्योंकि इसकी मिट्टी से ऐसे कवक को खोज निकाला है, जिसने हर्बल कलर को जन्म दिया है।यह खोज आईटीएम यूनिवर्सिटी के माइक्रोबायोलॉजी डिपार्टमेंट से रिसर्च कर रहीं स्वाति चित्रांशी ने की है। इस कवक की मदद से लाल रंग भी तैयार कर लिया गया है, जो फिलहाल लैब में विशेष तापमान पर सुरक्षित है।

स्किन विशेषज्ञों का कहना है कि कलर्स का जीवन में खासा महत्व है, क्योंकि इसके बिना न तो खाद्य पदार्थ को खूबसूरती प्रदान की जा सकती है और न ही गारमेंट सेक्टर को दुनिया को रोशन किया जा सकता है। लेकिन मौजूदा समय में सिंथेटिक कलर्स की हर जगह उपस्थिति होने से लोगों को कई बीमारियों का शिकार होना पड़ रहा है। इस परेशानी से सिर्फ हर्बल कलर्स से ही बचा जा सकता है।

दो वर्ष की मेहनत लाई रंग

इस प्रोजेक्ट पर चित्रांशी ने दो वर्ष काम किया, उन्हें पहली सफलता 8 माह पूर्व मिली थी। इस कार्य को आगे बढ़ाने में मदद स्कूल ऑफ लाइफ साइंसेस के डीन डॉ. जेएल भट्ट ने दी। चित्रांशी और डॉ. भट्ट ने चंबल की मिट्टी से 50 कवक पृथक कर लिए हैं। डॉ. भट्ट का कहना है कि जो कवक पृथक किए हैं वह पैंसिलियम की प्रजाति है। इसका नाम आईटीएम यूनिवर्सिटी से हमेशा जोड़े रखने के लिए 'आईटीएमयू नाम दिया है।

कलर को मापदंडों पर जांचा

इसके अलावा इस प्रजाति से तैयार कलर को एनसीबीआई गेन बैंक (नेशनल सेंटर फॉर बायोटेक्नोलॉजी इंस्टीट्यूट, यूएसए) के पास कुछ दिन पहले पहुंचाया भी, जिसे उसने सभी मापदंडों पर जांचकर परिग्रहण नंबर प्रदान किया है, जो एसपी, केएफ 952244 है। इतना ही नहीं चंबल की मिट्टी से पांच अन्य प्रजाति के कवक खोजे गए हैं, जिनसे आने वाले समय में अन्य कलर्स को जन्म दिया जाएगा।

आम लोगों को मिलेगा फायदा

स्किन रोग विशेषज्ञ डॉ. अनुभव गर्ग का कहना है कि उनके पास गत एक वर्ष से ऐसे मरीज सर्वाधिक पहुंच रहे हैं, जिनकी स्किन पर कैमिकलयुक्त कलर्स को यूज करने की वजह से रेशेस, ईचिंग या फिर स्वाइलिंग है। गौर किया जाए तो कई लोग तो ऐसे हैं, जो तकलीफ होने पर बिना डॉक्टर की सलाह लिए किसी और व्यक्ति के कहने पर क्रीम यूज कर लेते है।

यह बात अलग है, मार्केट में लगभग 5 हजार कंपनीज काम कर रही हैं, लगभग ऐसी हैं, जो कंपोनेंट का ध्यान नहीं रख रही हैं। ऐसी कंपनीज की क्रीम शुरू-शुरू में असर तो करती है, लेकिन बाद में बंद करने वाले स्किन को बर्बाद कर देती है। हर्बल कलर का उपयोग कम हो या अधिक, स्किन को कभी नुकसान नहीं पहंुचता है।

रहेगी बॉडी फिट

फिजीशियन डॉ. अजय पाल का कहना है कि लगभग खा पदार्थों में ऐसे कलर्स यूज किए जा रहे हैं, जो पेट में पहुंचने पर लिवर या फिर किडनी को फेल कर देते है। अगर हर्बल कलर्स को यूज में लिया जाता है तो पेट से जुड़ी समस्याओं से छुटकारा पाया जा सकता है।

कराएंगे पेटेंट

चंबल की मिट्टी से तैयार किए गए कलर को लेकर आईटीएम प्रबंधन गंभीर है। जब सात कलर्स को तैयार कर लिया जाएगा, तब इन्हें पेटेंट कराने की तैयारी शुरू की जाएगी और बड़े स्तर पर काम शुरू किया। जिससे लोगों को कलर्स की वजह से होने वालीं बीमारियों से बचाया जा सके।

डॉ. जेएल भट्ट, डीन, स्कूल ऑफ लाइफ साइंसेस

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