अबॉर्शन कानून में संशोधन पर 'नैतिकता बनाम चिकित्सा'Updated: Tue, 12 Aug 2014 09:04 AM (IST)

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होगी कि गर्भपात की सीमा अधिकतम 20 हफ्तों से बढ़ाकर 28 हफ्ते कर दी जाए या नहीं।

देश में अबॉर्शन यानी गर्भपात को लेकर बहस फिर तेज हो गई है। सुप्रीम कोर्ट उस याचिका पर सुनवाई के लिए राजी हो गया है, जिसमें मांग की गई है कि गर्भपात की सीमा अधिकतम 20 हफ्तों से बढ़ाकर 28 हफ्ते कर दी जाए।

गर्भपात को लेकर वर्तमान में मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (एमटीपी) एक्ट लागू है, जो 1971 में बना था। संशोधन के लिए इसी कानून की पीड़ित दो महिलाओं और मुंबई के डॉक्टर निखिल दातार ने याचिका लगाई है। डॉ. दातार ने 2008 में भी बॉम्बे हाई कोर्ट में इस कानून को चुनौती दी थी, लेकिन अपनी बात साबित नहीं कर सके थे।

अब महिला अधिकार और गर्भवति के स्वास्थ्य का हवाला देते हुए कानून में संशोधन की पुनः मांग की है। इस बार याचिका को नेशनल कमिशन फॉर वुमन, द फेडरेशन ऑफ ऑब्स्टट्रिशन एंड गायनेकोलॉजिस्ट ऑफ इंडिया (एफओजीएसआई) के साथ ही कई महिला संगठनों का भी समर्थन हासिल है।

याचिका में यह तथ्य भी रखा गया है कि आज अत्याधुनिक चिकित्सा तकनीक उपलब्ध है। किसी भी स्तर पर सुरक्षित गर्भपात कराया जा सकता है। गर्भधारण के 20 हफ्तों बाद गर्भपात की अनुमति नहीं होने से कई महिलाओं को बहुत बुरे दौर से गुजरना पड़ा है।

देश में छिड़ी है बहस

इस मसले पर देश में दो धड़े बनते नजर आ रहे हैं। एक तरफ स्त्री रोग विशेषज्ञ हैं, जो कानून में बदलाव के पक्ष में हैं, वहीं कुछ सामाजिक कार्यकर्ता इसके पूरी तरह खिलाफ हैं।

पक्ष : प्रमुख अंगों की विकृति का पता लगा सकेंगे

  • यह कहना गलत है कि 20 सप्ताह बाद भ्रूण का लिंग पता चल जाता है और इससे कन्या भ्रूण हत्या के मामले बढ़ेंगे।
  • दरअसल, जननांग का पता तो 14 से 16 हफ्ते की प्रेगनेंसी के दौरान ही अल्ट्रासाउंड से लगाया जा सकता है।
  • वहीं हार्ट, ब्रेन या किडनी में किसी तरह की विकृति का पता 24 हफ्तों के बाद ही लगाया जा सकता है।
  • उदाहरण के लिए, भ्रूण के मस्तिष्क में पानी का भरना 24 हफ्तों के बाद ही दिखाई देता है।
  • यदि डॉक्टर की देखरेख में 28 हफ्ते तक गर्भपात की अनुमति दी जाती है तो यह गर्भवति के लिए पूरी तरह सुरक्षित होगा।
  • गर्भ में दर्द का अहसास कराने वाले तंतु 30 हफ्तों बाद ही विकसित होते हैं।
  • यदि इस अवधि के बाद गर्भपात की नौबत आती है, तो इंटरनेशनल एथिक्स कमेटी की सिफारिशों के मुताबिक, गर्भ को सुन्न कर दिया जाता है।

विपक्ष : अक्षम बच्चे को जन्म लेने और जीने का हक

  • पूरी तरह से विकसित भ्रूण को मारना नैतिकरूप से गलत है। अक्षम/अपाहिज बच्चे को भी जन्म लेने और जीवन जीने का अधिकार है।
  • जिन डॉक्टरों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है, उनकी नियत ठीक नहीं है।
  • 20 हफ्ते बाद यदि परिपक्व बच्चा जन्म लेता है, तो उसके जीवित रहने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं।
  • गर्भपात में जितनी देरी की जाएगी, भ्रूण को उतनी अधिक पीड़ा झेलना होगी। 20 हफ्ते बाद का गर्भपात मां के लिए भी नुकसानदायक होगा।
  • डॉक्टरों को गर्भपात की अवधि बढ़ाने की वकालत करने के बजाए मसले के मानवीय पहलू की तरफ सोचना चाहिए।
  • वर्तमान में लागू कानून में कुछ निश्चित परिस्थितियों में गर्भपात की अनुमति दी गई है। जैसे- दुष्कर्म, गर्भवति का नाबालिग होना, भ्रूण या महिला के जीवन पर कोई जोखिम आना।
  • कानून में बदलाव तो इस पहलू से किया जाना चाहिए कि भ्रूण को किस चीज से पीड़ा हो सकती है। साथ ही नैतिक पहलू भी देखना जाना चाहिए।

कानून की बाध्यता ने दिया दर्द

(डॉ. निखिल दातार के साथ याचिका दायर करने वाली दो महिलाओं की कहानी)

केस-1 : अंजू (काल्पनिक नाम) को गर्भधारण के बाद पहले चेकअप में पता चला कि उनके भ्रूण में कई जटिलताएं हैं और वह जन्म के बाद ज्यादा देर जीवित नहीं रह सकेगा। तब तक 26 हफ्तों का गर्भ हो चुका था और गर्भपात की अनुमति नहीं मिली। उन्हें गर्भधारण जारी रखने के लिए बाध्य किया गया। आखिरकार तीन दिन की असहाय पीड़ा के बाद उन्होंने बच्चे को जन्म दिया जो महज तीन घंटे जीवित रहा। अंजू ने कोर्ट में पेश अपने हलफनामे में लिखा है कि वह दौर बहुत परेशानी वाला था। आमतौर पर महिला गर्भधारण की पीड़ा यह सोचकर सह लेती है कि उसके जिगर का टुकड़ा दुनिया में आने वाला है, लेकिन मैंने सबकुछ भुगता, जबकि मुझे पता था कि आखिरी में मेरी झोली खाली ही रहेगी।

केस-2 : गर्भधारण के 19वें हफ्ते में डॉक्टर ने मानसी (काल्पनिक नाम) को बताया गया कि ब्रेन टिश्यू की कमी के कारण भ्रूण का विकास नहीं हो पा रहा है। आगे की प्रगति के लिए 20वें हफ्ते तक इंतजार करना पड़ेगा। मानसी को गर्भपात की 20वें हफ्ते तक की बाध्यता की जानकारी थी। उन्हें आगे मेडिकल जांच जारी रखने के बजाए गर्भपात का मुश्किल फैसला लेना पड़ा। अब उनका कहना है कि कुछ और हफ्तों की मोहलत मिलती तो शायद भ्रूण का विकास हो सकता था।

विदेशों में क्या है नियम?

  • ब्रिटेन में 24 हफ्तों तक गर्भपात की अनुमति है। वहीं अमेरिका में इसके बाद तक की छूट प्रदान की गई है। स्पेन ने यह अवधि 22 हफ्तों की रखी गई है।
  • वहीं जर्मनी, रोमानिया, आयरलैंड, बेल्जियम, पुर्तगाल, ऑस्ट्रिया, पोलैंड, स्वीडन, लक्जमबर्ग और हंगरी जैसे यूरोपीय देशों में गर्भधारण के 12 हफ्तों बाद गर्भपात गैरकानूनी है।
  • उक्त प्रत्येक देश के करीब 30,000 महिलाएं हर साल यूके या स्पेन जाकर गर्भपात करती हैं।
  • खास बात यह भी है कि इन दोनों देशों में गर्भपात के लिए पति की अनुमति अनिवार्य नहीं है।
  • 2.60 करोड़ बच्चे जन्म लेते हैं हर साल भारत में
  • 2-3 फीसद शिशु भीषण जटिलताओं के साथ पैदा होते हैं
  • 47 हजार महिलाओं की मौत होती है दुनियाभर में गर्भपात के दौरान
  • 86 फीसद गर्भपात विकासशील देशों में होते हैं, जहां सख्त कानून है

4 माह बाद अबॉर्शन हराम : फतवा

इस्लाम में भ्रूण हत्या के खिलाफ बहुत सख्ती है। 2011 में दारुल उलूम देवबंद ने फतवा जारी कर कहा था कि तीन से चार महीने के भ्रूण में अल्लाह रूह डाल देता है और ऐसे में अबॉर्शन कराना हराम है, भले ही भ्रूण के अंग अविकसित ही क्यों न हो।

दरअसल, देवबंद से पूछा गया था कि यदि तीन से चार महीने के भ्रूण में मस्तिष्क अविकसित पाया गया, तो क्या अबॉर्शन की अनुमति है? इसका जवाब देते हुए यह फतवा जारी किया गया। कहा गया कि 4 माह के पहले जब तक भ्रूण में जाम नहीं होती, मजबूरी की स्थिति में अबॉर्शन कराया जा सकता है।

सविता ने दिलाई थी आयरलैंड में गर्भपात को मान्यता

भारतीय मूल की दंत चिकित्सक 31 साल की सविता हलप्पनवर की अक्तूबर 2012 में समय पर गर्भपात न होने के कारण मौत हो गई थी। इसके बाद आयरलैंड में बहस छिड़ गई कि क्यों न विशेष परिस्थितियों में गर्भपात की संवैधानिक इजाजत दी जाए। इस मुद्दे पर कैथोलिक मान्यता वाले इस देश के लोगों की तरह ही सांसदों में भी काफी मतभेद सामने आए। यहां तक कि एक मंत्री ने अपने पद से त्यागपत्र भी दे दिया था।

बड़ी संख्या में लोग प्रदर्शन करते हुए सड़कों पर उतरे। आखिरकार वहां की संसद ने दो दिन की लंबी बहस के बाद विशेष परिस्थितियों में गर्भपात को मान्यता दे दी है। 31 के मुकाबले 127 मतों से पारित ‘गर्भ के दौरान जीवन रक्षा विधेयक’ में कहा गया है कि जब डॉक्टरों को ऐसा लगता है कि किसी महिला की जान खतरे में है तो वह उसकी जान बचाने के लिए गर्भपात कर सकता है।

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