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अद्भुत है 800 वर्ष पुराने इस शिवमंदिर की अष्टकोणीय संरचनाUpdated: Mon, 12 Feb 2018 04:01 AM (IST)

इसका कई पुनर्निर्माण कराए जाने के बाद भी मंडप आज तक पूरा नहीं बना पाने सफलता नहीं मिल सकी।

कटघोरा, कोरबा (छत्तीसगढ़)। पाली के प्राचीन शिवमंदिर की एक खासियत ऐसी भी है, जो इसकी संरचना को राज्य में अद्वितीय बनाता है। वैसे तो ऐतिहासिक महत्व वाले कई प्राचीन मंदिर प्रदेशभर में निर्मित हैं, लेकिन तकनीकी दृष्टिकोण से यहां का अष्टकोणीय मंडप आधारित देवालय छत्तीसगढ़ में कहीं और नहीं।

यह एक वर्ग के कोनों को काटने से बनी एक अद्भुत आकृति है, जो गर्भगृह से जुड़कर मंदिर को पूरा करती है। यही पुरातात्विक गुण इस ऐतिहासिक शिवमंदिर को राज्य की अन्य संरचनाओं से अलग पहचान देता है।

अष्टकोणीय मंडप आधारित यह पुरातन देवालय ही वह खासियत है, इसकी संरचना को अन्य पुरातात्विक धरोहरों से अद्भुत बनाता है और अलग करता है। बारहवीं शताब्दी में राजा विक्रमादित्य द्वितीय ने पाली के नौकोनिहा तालाब के समीप इस प्राचीन शिवमंदिर का निर्माण कराया था।

मंडप की छत व बाहरी दीवारों पर शिला का इस्तेमाल कर बारीकी से स्थापित की गई देवी-देवताओं की मूर्तियां विशेष आकर्षण का केंद्र हैं। जिले की पुरातन संस्कृति और सांस्कृतिक वैभव का सदियों से साक्षी रहा यह मंदिर अब राज्य सहित देश भर में अपनी ऐतिहासिक विरासत के लिए पहचाना जाता है। महाशिवरात्रि पर्व के अवसर पर शिवमंदिर में दर्शन पाने हजारों की संख्या में श्रद्धालु हर साल पहुंचते हैं।

आठ दिशाओं की एक व्यवस्था प्रदर्शित

मंदिर की अष्टकोणीय संरचना को जानने के लिए कुछ तकनीकी बारीकियों को समझना होगा। यह एक वर्ग के कोनों को काटने से बनी एक अद्भुत आकृति है, जो गर्भगृह से जुड़कर मंदिर को पूरा करती है। मंडप के छत की परिधि को ऊपर की तरफ से कम करते हुए हल्की शिलाओं से कुशल हाथों ने बड़ी बारीकी से गढ़ा है।

मंडप व बाहरी दीवारों में करीने से निर्धारित क्रम में पुरातन देवी-देवताओं की अनेक मूर्तियां स्थापित हैं, जिन्हें दो क्षैतिज पंक्तियों व एक निश्चित अंतराल में गहराई से गढ़ी गई हैं। यह क्रम आठ दिशाओं की एक व्यवस्था को दर्शाता है। गर्भगृह के दरवाजे पर चौखट की तीन पैनलों में नदियों की देवियां अवस्थित हैं।

कई बार पुनर्निर्माण, फिर भी मंडप अधूरा

पाली के नौकोनिहा तालाब के तट पर अवस्थित ऐतिहासिक शिव मंदिर के अंदर मिले शिलालेख से अवलोकन से पता चलता है कि इसका निर्माण 9 से 12वीं सदी के बीच कराया गया। उस काल में राजा विक्रमादित्य द्वितीय ने मंदिर का निर्माण कराया था।

कालांतर में गुप्त व उसके बाद पल्लव वंश के शासकों के लिए यह ऐतिहासिक नगर काफी महत्वपूर्ण था, जिसकी ख्याति दूर-दूर तक रही। इस प्राचीन शिव मंदिर के पुरातात्विक महत्व का ज्ञान होने पर भारतीय पुरातत्व संरक्षण विभाग ने इसका पुनर्निर्माण करने की कोशिश भी की। इसका कई पुनर्निर्माण कराए जाने के बाद भी मंडप आज तक पूरा नहीं बना पाने सफलता नहीं मिल सकी।

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