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यहां तो अदालत ही तोड़ती है कुंभकर्णी नींदUpdated: Fri, 14 Oct 2016 09:40 PM (IST)

पड़ोसी राज्यों से आए पराली के धुएं के साथ दिल्ली की धूल व धुआं मिलकर राजधानी के वायुमंडल में लगातार जहर घोल रहा है।

हरिकिशन शर्मा, नई दिल्ली

पराली जलाने से राष्ट्रीय राजधानी में होने वाले वायु प्रदूषण को रोकने में पड़ोसी राज्यों की उदासीनता के साथ-साथ दिल्ली सरकार की नाकामी भी समस्या को गंभीर बना रही है। अदालत के निर्देश पर पर्यावरण शुल्क तो लगा दिया गया, लेकिन सरकार को उस धनराशि के खर्च करने का रास्ता ही नहीं सूझ रहा है। इससे समस्या विकट हो रही है।

पड़ोसी राज्यों से आए पराली के धुएं के साथ दिल्ली की धूल व धुआं मिलकर राजधानी के वायुमंडल में लगातार जहर घोल रहा है। दिल्ली में वायु प्रदूषण की समस्या को लेकर अदालती आदेश से पहले सरकार मानो हरकत में नहीं आती। इसका ताजा उदाहरण दो हजार सीसी वाले डीजल वाहनों पर लगाए गए पर्यावरण संरक्षण शुल्क का है।

सुप्रीम कोर्ट ने बीते 12 अगस्त को दिल्ली एनसीआर में पंजीकृत होने वाली 2000 सीसी से अधिक इंजन क्षमता की डीजल गाड़ियों के एक्स शोरूम मूल्य पर एक प्रतिशत पर्यावरण संरक्षण शुल्क (ईपीसी) लगाया था। यह शुल्क केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के पास जमा हो रहा है। सूत्रों के मुताबिक इसके तहत रोजाना करीब 10 लाख रुपये जमा हो रहे हैं।

केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अनुसार अब तक इस सीपीसीबी के खाते में 3.12 करोड़ रुपये से अधिक जमा हो चुके हैं। दैनिक जागरण ने जब यह जानने की कोशिश की कि क्या इस राशि को खर्च करने के लिए कोई नियम तय किए गए हैं तो पर्यावरण मंत्रालय से कोई जवाब नहीं मिला।

चौंकाने वाली बात यह है कि सरकार को यही पता नहीं है कि यह भारी भरकम राशि खर्च कैसे होगी। इस बारे में पर्यावरण मंत्रालय या सीपीसीबी के पास कोई योजना ही नहीं है। सीपीसीबी ने इस राशि के इस्तेमाल के संबंध में न तो जनता से कोई सुझाव मांगे हैं, न ही कोई योजना ही सार्वजनिक की है।

सीपीसीबी ने पर्यावरण संरक्षण शुल्क के बारे में आम लोगों को समझाने के लिए 19 सवालों की प्रश्नोत्तरी तो जारी की है, लेकिन इसमें यह कहीं नहीं बताया गया है कि इससे जमा धनराशि का इस्तेमाल किस तरह किया जाएगा।

उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल दिसंबर में आदेश जारी कर राजधानी दिल्ली में 2000 सीसी से अधिक इंजन क्षमता की डीजल गाड़ियों के पंजीकरण पर रोक लगा दी थी। वाहन निर्माता कंपनियों ने शीर्ष अदालत में जब गुहार लगाई तो इन गाड़ियों पर एक प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क के साथ पंजीकरण की इजाजत दे दी गई।

दिल्ली को प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए कई दशकों से कानूनी लड़ाई लड़ रहे वरिष्ठ अधिवक्ता एम.सी मेहता का कहना है कि इस राशि का इस्तेमाल लोगों में जागरुकता लाने के लिए होना चाहिए। अफसोस की बात यह है कि केंद्र और दिल्ली सरकार प्रदूषण की समस्या पर तभी जागते हैं जब या तो सुप्रीम कोर्ट निर्देश देता है या फिर जनता का दवाब होता है। वास्तविकता यह है कि दिल्ली को प्रदूषणमुक्त बनाने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति ही नहीं है।

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