मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ चार जजों का विद्रोहUpdated: Sat, 13 Jan 2018 12:15 AM (IST)

विवादों को सुलझाने वाली शीर्ष न्यायिक संस्था खुद ही कठघरे में खड़ी हो गई है।

नई दिल्ली। विवादों को सुलझाने वाली शीर्ष न्यायिक संस्था खुद ही कठघरे में खड़ी हो गई है। एक अभूतपूर्व घटना में शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठ न्यायाधीशों ने मुख्य न्यायाधीश (सीजेआइ) दीपक मिश्रा के खिलाफ सार्वजनिक मोर्चा खोल दिया। आगाह किया कि संस्थान में सब कुछ ठीक नहीं है। स्थिति नहीं बदली तो संस्थान के साथ साथ लोकतंत्र भी खतरे में है। मीडिया के सामने आने के न्यायाधीशों के चौंकाने वाले फैसले ने न सिर्फ आंतरिक कलह को खोलकर सामने रख दिया है, बल्कि कानूनविदों को भी खेमे में बांट दिया। पूरे दिन यह अटकल चलती रही कि जवाब में सीजेआइ भी अपना पक्ष रख सकते हैं। उन्होंने अटार्नी जनरल केके वेणुगोपाल से बात जरूर की, लेकिन खुद मीडिया से दूर रहे। अटार्नी जनरल के मुताबिक, जजों को प्रेस कांफ्रेंस करने जैसे कदम से बचना चाहिए था।

शुक्रवार का दिन सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में अभूतपूर्व घटना के रूप में दर्ज हो गया। यूं तो कई मसलों पर कोर्ट के अंदर मतभेद की चर्चा होती रही है, लेकिन मीडिया से दूरी बनाकर रखने की सारी परंपराएं टूट गईं। व्यवस्था को लेकर बगावत हुई और खुले तौर पर आरोप भी लगाए गए। लोकतंत्र के तीसरे स्तंभ में मोटी दरार दिखी। मुख्य न्यायाधीश के बाद वरिष्ठता में दूसरे से पांचवें क्रम के जजों यानी जस्टिस जे. चेलमेश्वर, जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस एमबी लोकुर और जस्टिस कुरियन जोसेफ ने मीडिया से रूबरू होते हुए आरोप लगाया कि "सुप्रीम कोर्ट प्रशासन में सब कुछ ठीक नहीं है और कई ऐसी चीजें हो रही है जो नहीं होनी चाहिए। अगर यह संस्थान सुरक्षित नहीं रहा तो लोकतंत्र खतरे में पड़ जाएगा।"

सात पेज का पत्र किया जारी

जस्टिस चेलमेश्वर ने कहा कि चारों जजों ने मुख्य न्यायाधीश को कुछ दिनों पहले पत्र लिखकर अपनी बात रखी थी। शुक्रवार को भी सुबह उनसे मुलाकात कर शिकायत की, लेकिन वह नहीं माने। इसीलिए लोकतंत्र की रक्षा के लिए उन्हें मीडिया के सामने आना पड़ा। उन्होंने मीडिया को सात पेज की वह चिट्ठी भी वितरित की जो जस्टिस मिश्रा को लिखी गई थी। उसमें मुख्य रूप से पीठ को केस आवंटित किए जाने के तरीके पर आपत्ति जताई गई है। न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया के एक मुद्दे का तो पत्र में उल्लेख है लेकिन माना जा रहा है कि यह खींचतान लंबे अर्से से चल रही थी। शायद सीबीआइ जस्टिस बीएच लोया की मौत का मुकदमा तात्कालिक कारण बना, जिस पर शुक्रवार को ही सुप्रीम कोर्ट की अन्य बेंच में सुनवाई थी।

जजों की प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद अटॉर्नी जनरल से मिले CJI

ऐसा करना तकलीफदेह

अपने आवास के लॉन में खचाखच भरे मीडिया कर्मियों से रूबरू जस्टिस चेलमेश्वर ने कहा कि उन्हें बहुत भारी मन के साथ प्रेस के सामने आना पड़ा है क्योंकि "वह नहीं चाहते बीस साल बाद कोई बोले कि उन्होंने अपनी आत्मा बेच दी।" सुप्रीम कोर्ट में तनातनी का आलम क्या है, इसका अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि चिट्ठी में ही चारों जज ने साफ किया कि "मुख्य न्यायाधीश सुप्रीम नहीं हैं। पीठ को केस आवंटित करने का उनका अधिकार भी केवल सामान्य परंपरा का हिस्सा है, कानून नहीं।" एक सवाल के जवाब में जस्टिस रंजन गोगोई ने रैंक तोड़ने की बात से इन्कार करते हुए कहा-"वह देश के प्रति अपने ऋण को चुका रहे हैं।" ध्यान रहे कि जस्टिस गोगोई ही अगले मुख्य न्यायाधीश बनने वाले हैं। वैसे चारों न्यायाधीश वरिष्ठ हैं और कोलेजियम में मुख्य न्यायाधीश के अलावा ये ही चारों हैं। यह पूछने पर कि क्या वह जस्टिस मिश्रा का महाभियोग चाहते हैं, जस्टिस चेलमेश्वर ने कहा-"अपने शब्द हमारे मुंह में न डालिए।"

जजों के प्रमुख आरोप

- सीजेआइ कुछ खास मामले पसंद की पीठों और जजों को ही सौंपते हैं। केस बंटवारे में नियमों का पालन नहीं कर रहे।

-सीजेआइ बराबर के जजों में प्रथम होते हैं, न कि उनसे कम या ज्यादा।

-सीजीआइ उस परंपरा से बाहर जा रहे हैं, जिसके तहत महत्वपूर्ण मामलों में निर्णय सामूहिक तौर पर लिए जाते रहे हैं।

-कोर्ट में बहुत कुछ ऐसा हुआ है, जो नहीं होना चाहिए था। इससे संस्थान की छवि बिगड़ी है।

सुप्रीम कोर्ट पर एक नजर

स्वीकृत 31 पदों में से फिलहाल 25 जज हैं। सीजेआइ दीपक मिश्रा का कार्यकाल दो अक्टूबर, 2018 तक है। उसके बाद जस्टिस रंजन गोगोई अगले सीजेआइ होंगे, क्योंकि जस्टिस चेलमेश्वर जून में ही रिटायर हो जाएंगे।

केस बंटवारे का पारंपरिक तरीका

सीजेआइ प्रशासनिक प्रमुख होने के नाते विषयवार रोस्टर बनाते हैं। संबंधित केस उसके हिसाब से ही संबंधित पीठ को सौंपे जाते हैं। आरोप इस व्यवस्था के बाहर जाकर केस बंटवारे का है।

उठने वाले सवालों के जवाब-

-क्या इन चार जजों के खिलाफ कार्रवाई हो सकती है?

मुमकिन नहीं लगता। प्रशासनिक कार्रवाई का बहुत ज्यादा स्कोप नहीं है। उन्हें सिर्फ महाभियोग के जरिए ही पद से हटाया जा सकता है। इसकी प्रक्रिया लंबी है और यह संसद से पारित होता है। इसकी गुंजाइश नहीं दिखती।

-मुख्य न्यायाधीश क्या कर सकते हैं?

आरोप लगने के बाद नैतिक आधार पर इस्तीफा देना एक विकल्प हो सकता है। लेकिन यह पूरा-पूरा उनके विवेक पर निर्भर करेगा। इसके लिए उन्हें मजबूर नहीं किया जा सकता है।

-सुप्रीम कोर्ट के कामकाज पर क्या असर होगा?

चारों जजों ने कहा है कि वह पूर्ववत अपना काम करेंगे। इसलिए न्यायिक कामकाज चलता रहेगा।

-विवाद का समाधान क्या हो सकता है?

सरकारी सूत्रों ने दखल देने से इन्कार किया है। उससे यह अपेक्षित भी नहीं है। कानून के जानकारों के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट की प्रतिष्ठा को देखते हुए सभी जजों को आपस में बैठकर पारदर्शी समाधान निकालना चाहिए।

हमने मीडिया से बात करने का फैसला इसलिए किया, ताकि 20 साल बाद कोई यह न कहे कि हमने अपनी आत्मा बेच दी।

-जस्टिस जे. चेलमेश्वर

कोई अनुशासन नहीं तोड़ रहा है। हम देश का कर्ज चुकाने का दायित्व निभा रहे हैं।

-जस्टिस रंजन गोगोई

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