अब व‌र्ल्ड कप भी जाएगा, जानिए हैरान करने वाले 7 कारण!Updated: Thu, 23 Jan 2014 12:13 PM (IST)

आपके सामने कुछ ऐसे कारण और कमजोरियां रखते हैं जिनसे अगर निजात नहीं पाया गया तो विश्व कप भी हाथ से जाना तय है।

नई दिल्ली। ये क्रिकेट का रोमांच और इस अद्भुत खेल की खूबसूरती ही है कि यहां सब कुछ हमेशा के लिए स्थिर नहीं रहता। टीम इंडिया की मौजूदा हालत इस बात की सबसे बड़ी गवाह है। जो वनडे टीम 2011 में विश्व चैंपियन बनी, फिर 2012 में जिस टीम को नया युवा रूप मिला और 2013 में दिग्गजों की गैरमौजूदगी में भी जिस टीम ने कई टूर्नामेंट जीतकर रैंकिंग में बादशाहत हासिल की..आज वही टीम ताश के पत्तों की तरह यूं बिखरती जा रही है कि फैंस को विश्व कप नजरों से दूर जाता नजर आने लगा है।

दक्षिण अफ्रीका के शर्मनाक दौरे के बाद अब न्यूजीलैंड में भी टीम इंडिया का वही हाल हुआ है। अगले साल इसी न्यूजीलैंड (ऑस्ट्रेलिया-न्यूजीलैंड 2015) की जमीन पर विश्व कप के मैच भी खेले जाने हैं, नतीजा क्या होगा इसकी तो भविष्यवाणी नहीं की जा सकती लेकिन आपके सामने कुछ ऐसे कारण और कमजोरियां रखते हैं जिनसे अगर निजात नहीं पाया गया तो विश्व कप भी हाथ से जाना तय है।

1. इन्हीं पिचों पर होनी है 2015 की परीक्षा

साल कब गुजर जाएगा पता भी नहीं चलने वाला और विश्व कप खिताब बचाने की वो घड़ी टीम इंडिया के सामने आ जाएगी जिससे पार पाना इस बार आसान नहीं होने वाला। नेपियर और हैमिल्टन में मिली दो लगातार हार इस चीज की दस्तक है कि धोनी सेना जाग जाए, क्योंकि 2015 में विश्व कप इन्हीं पिचों पर होना है, और टीम के मौजूदा हाल से ये बिल्कुल नहीं लग रहा कि इन पिचों पर हम खिताब बचाने का दावा मजबूती से रख पाएंगे। अभी न्यूजीलैंड में कई दिन बिताने हैं, कई और मैच खेलने हैं, ऐसे में धोनी सेना को अपना आत्मविश्वास दोबारा हासिल करके किसी भी हाल में जीत हासिल करनी होगी क्योंकि यहां मिलने वाली हार 2015 के अभियान और उसके लिए जरूरी मनोबल पर करारा वार करेगी।

2. एक खिलाड़ी पर कब तक निर्भर?

एक खिलाड़ी के कंधों पर चढ़कर आगे जाने की वो पुरानी आदत एक बार फिर टीम इंडिया के रंग-ढंग में नजर आने लगी है जो सचिन तेंदुलकर के जमाने में हुआ करती थी। भारतीय वनडे इतिहास ने एक दौर ऐसा भी देखा है जब पूरी टीम सचिन पर निर्भर होती थी और उनके जल्दी आउट होने का मतलब हार के दरवाजे पर दस्तक देना मान लिया जाता था। यही हाल अब विराट कोहली के साथ हो रहा है। पिछले कुछ सालों में तकरीबन हर दूसरे मैच में कोहली का टीम की नैया पार लगाने का जज्बा, अब टीम के लिए साइड इफेक्ट का काम करने लगा है। गंभीर परिस्थितियों में उनके टिकने व उनके आउट हो जाने से मैच की दिशा तय करने की आदत से टीम इंडिया को बचना होगा।

3. ढल रहा है 2011 का वो शेर और मिडिल ऑर्डर

2011 में टीम इंडिया की खिताबी जीत का सुपरहीरो व धौनी की टीम और मध्यक्रम को एक मजबूत आधार प्रदान करने वाला धमाकेदार बल्लेबाज युवराज सिंह अब कहीं खोता जा रहा है। मुमकिन है कि कुछ करिश्मा फिर देखने को मिले और जबरदस्त जज्बे वाला वो शेर फिर वापसी करके टीम की नींव मजबूत कर दे, लेकिन फिलहाल ऐसा नहीं होता दिख रहा। ना तो युवी अंतरराष्ट्रीय वनडे क्रिकेट में अपनी वापसी साबित कर पाए और अब ना ही घरेलू क्रिकेट में उनका बल्ला चल रहा है, ऐसे में ढलते मिडिल ऑर्डर को अगर युवी के बिना आगे बढ़ने के लिए नहीं तैयार किया गया तो नतीजे खराब दिखना तय हैं। ना रैना का बल्ला कई दिन से बोला है और ना जडेजा तो गेंदबाजी की धुन में जैसे अपने बल्लेबाजी के हुनर को भूल से गए हैं। ऐसे में क्या धौनी अकेले बार-बार अपनी टीम को खराब स्थितियों से निकाल पाएंगे।

4. इस 'बाउंस' के खौफ से कौन बचाएगा?

दक्षिण अफ्रीका जाने से पहले धोनी सेना ने उछाल भरी पिचों से आराम से निपटने की बात कही थी, लेकिन वहां जाकर हम लगातार बुरी तरह हारे और विरोधी टीम के मात्र दो-तीन गेंदबाजों ने ही हमारे बल्लेबाजी क्रम को बार-बार लगातार ढेर किया। इसका सबसे बड़ा कारण दिखा, उछाल व रफ्तार। इसके बाद वही उछाल की दिक्कत न्यूजीलैंड में भी नजर आई है। जहां एक दो बल्लेबाजों को छोड़कर तकरीबन सभी खिलाड़ी उछाल के खौफ में डूबते नजर आए हैं। हाल में खत्म हुई एशेज सीरीज पर अगर गौर फरमाएं तो इससे साफ है कि 2015 में ऑस्ट्रेलिया की जमीन पर होने वाले विश्व कप मैचों में भी गेंद कई बार हेल्मेट को छूकर निकलने वाली है।

5. ना मौजूद हैं गैरी और ना सचिन

चाहे बल्ला चले या ना चले लेकिन 2011 विश्व कप में विरोधी गेंदबाजों में सचिन के हुनर का खौफ तो था ही, एक दो मैच में वो अच्छा भी चले लेकिन असल भूमिका उन्होंने निभाई ड्रेसिंग रूम के अंदर और उनकी मौजूदगी कप्तान, टीम व विरोधी टीम पर प्रभाव डालने में सक्षम रही, लेकिन इस बार सचिन भी नहीं होंगे और मास्टर कोच व विश्व कप 2011 की जीत के मुख्य किरदारों में से एक, कोच गैरी क‌र्स्टन भी टीम का हिस्सा नहीं होंगे। ऐसे में धोनी व टीम को अपने नए कोच फ्लेचर के साथ अच्छी समझ बनानी ही होगी वरना मैदान पर नतीजे खराब ही मिलेंगे, क्योंकि सचिन की गैर मौजूदगी में मैदान पर उनके लिए कोई मेंटर व गाइड भी नहीं होगा।

6. क्या भरपाई हो गई दिल्ली के उन दो दिलेरों की?

2011 विश्व कप में टीम इंडिया का टॉप ऑर्डर दिल्ली के दो दिलेरों से सजा हुआ था। वीरेंद्र सहवाग और गौतम गंभीर। एक ने सलामी बल्लेबाज के तौर पर कई मैचों में टीम को धुआंधार शुरुआत दी तो दूसरे (गौतम गंभीर) ने हालात के हिसाब से खेलने के अपने गुण को बार-बार दिखाया व फाइनल में उन्हीं के बल्ले से निकली पारी (97 रन) ने ढलती टीम को जीत का मंच दिया। दोनों बल्लेबाज लंबे समय से टीम से बाहर हैं और वापसी भी मुश्किल नजर आ रही है। ऐसे में कभी हिट, कभी फ्लॉप होने वाली रोहित-धवन की सलामी जोड़ी से क्या विश्व कप जैसे मंच पर धूम मचाने की उम्मीद की जा सकती है।

7. ना जहीर, ना भज्जी, ना युवी और ना मुनफ..अब क्या होगा?

2011 विश्व कप में जंग हमारी जमीन पर थी, उसके साथ-साथ जहीर व भज्जी के पेस-स्पिन के दोहरे अनुभवी आक्रामण के साथ मुनफ की समय-समय पर किफायती गेंदबाजी और युवराज सिंह का हैरान कर देने वाला प्रदर्शन अब टीम में मौजूद नहीं है। ये वही चार गेंदबाज हैं जो भारत की तरफ से 2011 में सबसे ज्यादा विकेट लेने वाले गेंदबाज थे। जहीर (21 विकेट), युवराज (15 विकेट), मुनफ (11 विकेट) और हरभजन (9 विकेट)। ये चारों इस समय खराब दौर से गुजर रहे हैं और वनडे टीम में इनकी वापसी हो पाएगी या नहीं, कहना बेहद मुश्किल है। अब ना धोनी के पास गेंदबाजी में अनुभव है और ना उनके इशारों को बिना बोले समझने वाला गेंदबाज। इशांत की गेंदें लगातार पिट रही हैं, भुवनेश्वर अब भी अपने फॉर्म को बरकरार रहने की जंग लड़ रहे हैं, जडेजा कभी आसमानी प्रदर्शन करते हैं तो कभी लंबा सूखा दिखता है और अश्विन की गेंदें तो अब सिर्फ आइपीएल का खिलौना नजर आती हैं। ऐसे में मोहम्मद शमी पर क्या पूरी टीम का बोझ लादा जाएगा या ऑस्ट्रेलिया-न्यूजीलैंड की पिचों पर धोनी को खुद ग्लव्स उतारकर बार-बार गेंदबाजी का प्रयोग करना पड़ेगा?

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