इन पांच वजहों से बढ़ती गई धोनी के आलोचकों की संख्याUpdated: Wed, 29 Jun 2016 12:33 PM (IST)

महेंद्रसिंह धोनी भले ही भारत के सफलतम कप्तान है, लेकिन उन्हें नफरत करने वालों की संख्या चाहने वालों से ज्यादा है।

नई‍ दिल्ली। महेंद्रसिंह धोनी भले ही भारत के सफलतम कप्तान है, लेकिन उन्हें नफरत करने वालों की संख्या चाहने वालों से ज्यादा है। धोनी ने टीम इंडिया को सबसे ज्यादा सफलता दिलाई और उन्होंने कई कड़े निर्णय भी लिए जिसके चलते उनके आलोचकों की संख्या बढ़ती रही है। टेस्ट क्रिकेट को पहले ही अलविदा कह चुके धोनी का करियर इन दिनों ढलान पर है। आइए नजर डालते हैं उन कारणों पर जिनकी वजह से भारत को दो विश्व कप खिताब (2007 टी-20 विश्व कप और 2011 वन-डे विश्व कप) दिलाने वाले इस कप्तान के प्रति नफरत करने वालों की संख्या में दिनों-दिन इजाफा होता चला गया है।

1. सीनियरों खिलाड़ियों को बाहर करने की कूटनीति

धोनी वर्ष 2007 में टीम इंडिया के कप्तान बने और उन्होंने कई युवा क्रिकेटरों को मौका दिया। लेकिन इसकी गाज सीनियर खिलाड़ियों पर गिरी और उनके खराब प्रदर्शन के मद्देनजर उन्हें टीम से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। सचिन तेंडुलकर को छोड़ अन्य सभी सीनियरों (राहुल द्रविड़, सौरव गांगुली और लक्ष्मण) को टीम से बाहर होना पड़ा।

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साल 2011 में भारत की विश्व कप जीत के बाद दूसरे सीनियर खिलाड़ियों वीरेंद्र सहवाग, गौतम गंभीर, जहीर खान, हरभजन सिंह और जहीर खान को टीम से बाहर का रास्ता देखना पड़ा। इनमें से कई खिलाड़ियों को तो घरेलू क्रिकेट में अच्छा प्रदर्शन करने के बावजूद टीम इंडिया में धोनी की कूटनीति की वजह से शामिल होने का मौका नहीं मिला। वैसे भज्जी वापसी करने में सफल रहे।

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2. विदेशी धरती पर टेस्ट कप्तान के रूप में साबित हुए फिसड्डी

अनिल कुंबले द्वारा कप्तानी छोड़ने के बाद धोनी को टेस्ट टीम का कप्तान भी बनाया गया। इससे पहले धोनी ने सीमित ओवर की क्रिकेट में अपनी अच्छी छवि बना ली थी, इसलिए उनसे कुछ अलग करने की उम्मीद की जा रही थी। धोनी ने घरेलू मैदान पर तो बड़ी- बड़ी टीमों को धूल चटाने में सफलता अर्जित की और टेस्ट रैंकिंग में नंबर एक का तमगा भी हासिल कर लिया। लेकिन अभी तो बुरे दिन आने बाकी थे।

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साल 2011 के बाद टीम इंडिया ने कई विदेशी दौरे किए और टेस्ट सीरीज खेली, लेकिन धोनी इन सबमें फिसड्डी साबित हुए। पिछले 5 सालों में धोनी उपमहाद्वीप के बाहर एक भी टेस्ट सीरीज जीताने में कामयाब नहीं हो पाए। यही कारण रहा कि धोनी ने साल 2014 में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ टेस्ट सीरीज में 0-4 की हार के बाद टेस्ट कप्तानी से किनारा करने का फैसला किया। लेकिन इसके बावजूद उनसे नफरत करने वालों का गुस्सा जस का तस रहा।

3. अंतरराष्ट्रीय टीम में चेन्नई सुपर किंग्स के खिलाड़ियों को प्रमुखता देना

एमएस धोनी पर समय- समय पर आरोप लगते रहे हैं कि वे टीम इंडिया के चयन में अपनी आईपीएल टीम चेन्नई सुपर किंग्स (सीएसके) के खिलाड़ियों को प्राथमिकता देते हैं। भले ही अब सीएसके टीम दो सालों के लिए निलंबित हो गई हो, लेकिन धोनी का रवैया अभी भी लोगों के शक के घेरे में है।

4. कुछ खिलाड़ियों पर हद से ज्यादा भरोसा

एमएस धोनी को उनके अजीबोगरीब निर्णयों के लिए जाना जाता है। कई बार वे ऐसे खिलाड़ियों के साथ भी खड़े हो जाते हैं जो बेहद खराब फॉर्म से गुजर रहे होते हैं। जिसके कारण भी वे लोगों की आंखों की किरकिरी बन जाते हैं। अब आप साल 2012-13 सीजन को ही ले लीजिए। उस दौरान रोहित शर्मा बेहद खराब फॉर्म से गुजर रहे थे और न्यायसंगत तो ये था कि रोहित को टीम से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता। लेकिन ऐसा नहीं हुआ क्योंकि धोनी ने रोहित पर भरोसा जताया और उन्हें ओपनिंग बैटिंग करने के लिए भेजा। इसके बाद रोहित ने फॉर्म में वापसी कर ली।

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रोहित को हद से ज्यादा मौके देने पर उनकी खूब आलोचना हुई। इसी प्रकार रवींद्र जडेजा पर भी उन्होंने बहुत ज्यादा भरोसा किया। धोनी ने वर्ष 2014 में उन्हें खराब फॉर्म के बावजूद कई मौके दिए। उन्होंने अश्विन को अंतिम एकादश के बाहर बिठाकर भी जडेजा को टीम में जगह दी। यह बात कई लोगों को नागवार गुजरी।

5. धोनी का फिनिशर वाले गुण का एकदम से खत्म होना

धोनी के करियर में एक दौर था कि अगर वे बल्लेबाजी के लिए आ गए तो मैच में जीत दिलाकर ही लौटेंगे। यही कारण है कि उन्हें माइकल बेवन से भी अच्छा फिनिशर माना जाने लगा था। लेकिन पिछले कुछ सालों से धोनी के बल्ले से ना ही उतनी तेजी से रन निकल रहे हैं और ना ही वे मैच को अंतिम चरण पर ले जाकर खत्म कर पा रहे हैं। जाहिर है कि लोगों को धोनी का लगातार जूझना कतई पसंद नहीं आ रहा है।

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