संतान की रक्षा का पर्व अहोई अष्टमी आज, ऐसे करें व्रत और पूजनUpdated: Mon, 09 Oct 2017 08:40 AM (IST)

इसे वे स्त्रियां ही करती हैं, जिनके संतान होती है। यह व्रत दीपावली से ठीक एस सप्ताह पूर्व आता है।

मल्टीमीडिया डेस्क। इस बार अहोई अष्टमी 12 अक्टूबर 2017 को है। यह व्रत खासतौर पर संतान की रक्षा और उसके कल्याण के लिए किया जाता है। इसे वे स्त्रियां ही करती हैं, जिनके संतान होती है। दीपावली से ठीक एक सप्ताह पूर्व कार्तिक कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मनाए जाने वाले इस पर्व को अहोई अष्टमी या आठें कहा जाता है।

इस व्रत के दौरान अहोई देवी के चित्र के साथ सेई और सेई के बच्चों के चित्र बनाकर उनकी पूजा की जाती है। इस दिन बच्चों के कल्याण के लिए महिलाएं दिनभर उपवास रखती हैं और शाम को भक्ति-भावना के साथ दीवार अहोई की पुतली रंग भरकर बनाती हैं। आज-कल बाजार में अहोई के रंगीन चित्र भी मिलते हैं।

शाम 17.50 से है मुहूर्त -

अहोई अष्टमी 12 अक्टूबर 2017 को है, जिसकी पूजा 17.50 से 19.06 बजे तक होगी। इस रात को चंद्रमा 23.53 बजे उदित होगा। सूर्यास्त होने के बाद जब तारे निकलने लगते हैं, तो अहोई माता की पूजा की जाती है। पूजन से पहले जमीन को स्वच्छ करके, पूजा का चौक पूरकर, एक लोटे में जलकर उसे कलश की भांति चौकी के एक कोने पर रखें और भक्ति भाव से पूजा करें। बाल-बच्चों के कल्याण की कामना करें। साथ ही अहोई अष्टमी के व्रत कथा का श्रद्धा भाव से सुनें।

इसमें एक खास बात यह भी है कि पूजा के लिए माताएं चांदी की एक अहोई भी बनाती हैं। फिर अहोई की रोली, चावल, दूध व भात से पूजा करें। जल से भरे लोटे पर सातिया बना लें। एक कटोरी में हलवा तथा रुपए रख दें। अहोई माता की कथा सुनने के बाद अहोई की माला गले में पहन लें, जो बायना निकाल कर रखा है, उसे सास के पैर छूकर उन्हें दे दें। इसके बाद चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत खोलें।

इस व्रत पर धारण की गई माला को दिवाली के बाद किसी शुभ समय में अहोई को गले से उतारकर उसका गुड़ से भोग लगा। सास को रोली तिलक लगाकर उनके पैर छूकर व्रत का उद्यापन करें।

अहोई अष्टमी व्रत कथा -

प्राचीन काल में एक साहूकार था, जिसके सात बेटे और सात बहुएं थी। इस साहूकार की एक बेटी भी थी, जो दीपावली में ससुराल से मायके आई थी। दीपावली पर घर को लीपने के लिए सातों बहुएं मिट्टी लाने जंगल में गई, तो ननद भी उनके साथ हो ली।

साहूकार की बेटी, जहां मिट्टी काट रही थी उस स्थान पर साही अपने साथ बेटों से साथ रहती थी। मिट्टी काटते हुए गलती से साहूकार की बेटी की खुरपी के चोट से साही का एक बच्चा मर गया।

साही के बच्चे की मौत का साहूकारनी को बहुत दुख हुआ। परंतु वह अब कर भी क्या सकती थी, वह पश्चाताप करती हुई अपने घर लौट आई। कुछ समय बाद सहूकारनी के एक बेटे की मृत्यु हो गई। इसके बाद लगातार उसके सातों बेटों की मौत हो गई। इससे वह बहुत दुखी रहने लगी।

एक दिन उसने अपनी एक पड़ोसी को साही के बच्चे की मौत की घटना सुनाई और बताया कि उसने जानबूझ कर कभी कोई पाप नहीं किया। यह हत्या उससे गलती से हुई थी, जिसके परिणाम स्वरूप उसके सातों बेटों की मौत हो गई। यह बात जब सबको पता चली, तो गांव की वृद्ध औरतों ने साहूकार की पत्नी को दिलासा दिया।

वृद्ध औरतों साहूकार की पत्नी को चुप करवाया और कहने लगी आज जो बात तुमने सबको बताई है, इससे तुम्हारा आधा पाप नष्ट हो गया है। इसके साथ ही, उन्होंने साहूकारनी को अष्टमी के दिन भगवती माता और साही और साही के बच्चों का चित्र बनाकर उनकी आराधना करने को कहा।

उन्होंने कहा कि इस प्रकार क्षमा याचना करने से तुम्हारे सारे पाप धुल जाएंगे और कष्ट दूर हो जाएंगे। साहूकार की पत्नी उनकी बात मानते हुए कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को व्रत रखा व विधि पूर्वक पूजा कर क्षमा याचना की। इसी प्रकार उसने प्रतिवर्ष नियमित रूप से इस व्रत का पालन किया। जिसके बाद उसे सात पुत्र रत्नों की प्राप्ति हुई। तभी से अहोई व्रत की परंपरा चली आ रही है।

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