रमा एकादशी 15 अक्टूबर को, मोक्ष और समृद्धि देता है यह व्रतUpdated: Fri, 13 Oct 2017 08:32 AM (IST)

रमा देवी लक्ष्मी का दूसरा नाम है। इसलिए इस एकादशी में भगवान विष्णु के साथ मां लक्ष्मी की पूजा भी की जाती है।

मल्टीमीडिया डेस्क। हर साल दीपावली से चार दिन पहले कार्तिक कृष्ण एकादशी तिथि के दिन भगवान विष्णु और लक्ष्मी की पूजा करने का विधान है। इस एकादशी को रमा एकादशी एवं रंभा एकादशी के नाम से भी जाना जाता है।

चतुर्मास की अंतिम एकादशी होने के कारण इसका विशेष महत्व बताया गया है। यह एकादशी इस वर्ष 15 अक्टूबर को है। मान्यता है कि जो व्यक्ति इस दिन लक्ष्मी नारायण का ध्यान करते हुए व्रत रखता है उसके पापों का क्षय और पुण्यों में वृद्धि होती है।

व्यक्ति पाप कर्मों के प्रभाव से मुक्त होकर उत्तम लोक में स्थान प्राप्त करने का अधिकारी बन जाता है। इस व्रत में तुलसी की पूजा एवं भगवान विष्णु को तुलसी अर्पित करने का बड़ा महात्म्य है।

रमा देवी लक्ष्मी का दूसरा नाम है। इसलिए इस एकादशी में भगवान विष्णु के साथ मां लक्ष्मी की पूजा भी की जाती है। इससे व्यक्ति के जीवन में सुख, समृद्धि और खुशियां आती हैं। एकादशी के दिन घर में सुंदरकांड, भजन आदि करने का विधान है और साथ ही गीता का पाठ करना अच्छा माना जाता है।

व्रत की कथा

प्राचीनकाल में मुचुकुंद नाम का एक राजा था। उसकी इंद्र के साथ मित्रता थी और साथ ही यम, कुबेर, वरुण और विभीषण भी उसके मित्र थे। यह राजा बड़ा धर्मात्मा, विष्णुभक्त और न्याय के साथ राज करता था। राजा की एक कन्या थी, जिसका नाम चंद्रभागा था। कन्या का विवाह चंद्रसेन के पुत्र शोभन के साथ हुआ था। एक समय जब शोभन ससुराल आया। उन्हीं दिनों पुण्यदायिनी रमा एकादशी भी आने वाली थी।

दशमी तिथि को राजा ने ढोल बजवाकर सारे राज्य में यह घोषणा करवा दी कि एकादशी को कोई भी व्यक्ति भोजन नहीं करेगा इस दिन सारी प्रजा उपवास रखेगी। घोषणा सुनते ही शोभन को अत्यंत चिंता हुई। उसने अपनी पत्नी से कहा कि प्रिये, अब क्या करना चाहिए, मैं किसी प्रकार भी भूख सहन नहीं कर सकूंगा। ऐसा उपाय बतलाओ कि जिससे मेरे प्राण बच सकें।

चंद्रभागा कहने लगी कि स्वामी, मेरे पिता के राज में एकादशी के दिन कोई भी भोजन नहीं करता। हाथी, घोड़ा, ऊंट, बिल्ली, गौ आदि भी तृण, अन्न, जल आदि ग्रहण नहीं कर सकते, फिर मनुष्य का तो कहना ही क्या है। यदि आप भोजन करना चाहते हैं तो किसी दूसरे स्थान पर चले जाइए, क्योंकि यदि आप यहीं रहना चाहते हैं तो आपको अवश्य व्रत करना पड़ेगा।

ऐसा सुनकर शोभन कहने लगा कि मैं अवश्य व्रत करूंगा, जो भाग्य में होगा, वह देखा जाएगा। इस प्रकार से विचार कर शोभन ने व्रत रख लिया और वह भूख व प्यास से अत्यंत पीड़ि‍त होने लगा।

जब सूर्य नारायण अस्त हो गए और रात्रि को जागरण का समय आया। परंतु यह समय शोभन के लिए अत्यंत दु:खदायी हुआ। प्रात:काल होते शोभन के प्राण निकल गए। तब राजा ने सुगंधित काष्ठ से उसका दाह संस्कार करवाया। शोभन की अंत्येष्टि क्रिया के बाद चंद्रभागा अपने पिता के घर में ही रहने लगी।

रमा एकादशी के प्रभाव से शोभन को मंदराचल पर्वत पर धन-धान्य से युक्त तथा शत्रुओं से रहित एक सुंदर देवपुर प्राप्त हुआ। एक समय मुचुकुंद नगर में रहने वाले एक सोम शर्मा नामक ब्राह्मण तीर्थयात्रा करता हुआ घूमता-घूमता उधर जा निकला और उसने शोभन को पहचाना कि यह तो राजा का जमाई शोभन है।

शोभन भी उसे पहचान कर अपने आसन से उठकर उसके पास आया और प्रणाम करके कुशल प्रश्न किया। ब्राह्मण ने कहा कि राजा मुचुकुंद और आपकी पत्नी कुशल से हैं। नगर में भी सब प्रकार से कुशल हैं, परंतु राजन! हमें आश्चर्य हो रहा है। आप बताइये कि ऐसा सुंदर नगर जो न कभी देखा, न सुना, आपको कैसे प्राप्त हुआ।

तब शोभन बोला कि कार्तिक कृष्ण की रमा एकादशी का व्रत करने से मुझे यह नगर प्राप्त हुआ, परंतु यह अस्थिर है। यह स्थिर हो जाए ऐसा उपाय कीजिए। ब्राह्मण कहने लगा कि राजन! यह स्थिर क्यों नहीं है और कैसे स्थिर हो सकता है आप बताइए, फिर मैं अवश्य वह उपाय करूंगा। मेरी इस बात को आप मिथ्या न समझिए। शोभन ने कहा कि मैंने इस व्रत को श्रद्धारहित होकर किया है। अत: यह सब कुछ अस्थिर है। यदि आप मुचुकुंद की कन्या चंद्रभागा को यह सब वृत्तांत कहें तो यह स्थिर हो सकता है।

ऐसा सुनकर उस श्रेष्ठ ब्राह्मण ने अपने नगर लौटकर चंद्रभागा से सब वृत्तांत कह सुनाया। ब्राह्मण के वचन सुनकर चंद्रभागा बड़ी प्रसन्नता से ब्राह्मण से कहने लगी कि हे ब्राह्मण! ये सब बातें आपने प्रत्यक्ष देखी हैं या स्वप्न की बातें कर रहे हैं।

ब्राह्मण कहने लगा कि पुत्री! मैंने तुम्हारे पति को प्रत्यक्ष देखा है। साथ ही किसी से विजय न हो ऐसा देवताओं के नगर के समान उनका नगर भी देखा है। उन्होंने यह भी कहा कि यह स्थिर नहीं है। वह स्थिर रह सके उसके उपाय करना चाहिए।

चंद्रभागा ने कहा कि तुम मुझे वहां ले चलो, मुझे पतिदेव के दर्शन की तीव्र लालसा है। मैं अपने किए हुए पुण्य से उस नगर को स्थिर बना दूंगी। आप ऐसा कार्य कीजिए जिससे उनका हमारा संयोग हो क्योंकि वियोगी को मिला देना महान पुण्य है।

सोम शर्मा यह बात सुनकर चंद्रभागा को लेकर मंदराचल पर्वत के समीप वामदेव ऋषि के आश्रम पर गया। वामदेवजी ने सारी बात सुनकर वेद मंत्रों के उच्चारण से चंद्रभागा का अभिषेक कर दिया। तब ऋषि के मंत्र के प्रभाव और एकादशी के व्रत से चंद्रभागा का शरीर दिव्य हो गया और वह दिव्य गति को प्राप्त हुई।

इसके बाद बड़ी प्रसन्नता के साथ अपने पति के निकट गई। अपनी प्रिय पत्नी को आते देखकर शोभन अति प्रसन्न हुआ। और उसे बुलाकर अपनी बाईं तरफ बिठा लिया। चंद्रभागा कहने लगी कि प्राणनाथ! आप मेरे पुण्य को ग्रहण कीजिए। अपने पिता के घर जब मैं आठ वर्ष की थी तब से विधिपूर्वक एकादशी के व्रत को श्रद्धापूर्वक करती आ रही हूं। इस पुण्य के प्रताप से आपका यह नगर स्थिर हो जाएगा तथा समस्त कर्मों से युक्त होकर प्रलय के अंत तक रहेगा। ऐसा हुआ भी और इस प्रकार चंद्रभागा दिव्य आभू‍षणों और वस्त्रों से सुसज्जित होकर अपने पति के साथ आनंदपूर्वक रहने लगी।

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