जाने, किसे करना चाहिए श्राद्ध और क्या है इसका विधानUpdated: Thu, 07 Sep 2017 04:51 PM (IST)

पितृपक्ष को भारतीय संस्कृति में महत्वपूर्ण माना गया है। जाने किसे तर्पण करना चाहिए और क्यो?

भारतीय धर्म संस्कृति में पितरों को देवतुल्य माना गया है। मातृ देवो भवः तथा पितृ देवो भवः के भावना हमारे संस्कृति में उनके दिव्य स्थान को प्रदर्शित करता हैं। हमारे धर्मग्रंथों में भी पितृ श्राद्ध का विशेष उल्लेख किया गया है। प्रत्येक वर्ष आश्विन मास के कृष्ण पक्ष प्रतिपदा से अमावस्या तक के पंद्रह दिनों को पितृपक्ष के रुप में मनाया जाता है। पुराणों के अनुसार यह पखवाड़ा सिर्फ पितरों अर्थात पूर्वजों के पूजन और तर्पण के लिए सुनिश्चित है। सनातन धर्म में ऐसी मान्यता है कि पितृपक्ष में पूर्वजों का स्मरण और उनकी पूजा करने से उनकी आत्मा को शांति मिलती है।

किसे करना चाहिए श्राद्ध

श्राद्ध का अधिकार पुत्र को प्राप्त है। लेकिन यदि पुत्र जीवित न हो तो पौत्र, प्रपौत्र या विधवा पत्नी भी श्राद्ध कर सकती है। पुत्र के न रहने पर पत्नी का श्राद्ध पति भी कर सकता है। यदि पिता के अनेक पुत्र हों तो ज्येष्ठ पुत्र को श्राद्ध करना चाहिए। यदि सभी भाई अलग-अलग रहते हों तो वे भी अपने-अपने घरों में श्राद्ध का कार्य कर सकते हैं। यदि संयुक्त रूप से एक ही श्राद्ध करें तो वह अच्छा होता है। पुत्र परंपरा के अभाव में भाई तथा उनके पुत्र भी श्राद्ध का कार्य कर सकते हैं। यदि कोई भी उत्तराधिकारी न हो तो प्रपौत्र या परिवार का कोई भी व्यक्ति श्राद्ध कर सकता है। तर्पण तथा पिंडदान केवल पिता के लिए ही नहीं बल्कि समस्त पूर्वजों एवं मृत परिजनों के लिए भी किया जाता है। समस्त कुल, परिवार तथा ऐसे लोगों को भी जल दिया जाता है, जिन्हे जल देने वाला कोई न हो।

क्या है श्राद्ध करने का विधान

पितृपक्ष में पिंडदान मृत्युतिथि के दिन ही किया जाता है। देवताओं और ऋषियों को जल देने के बाद पितरों को जल देकर तृप्त किया जाता है। पितृपक्ष में पुरुषों को जल, तिल जौ, दुग्ध, कुश और श्वेत पुष्प आदि से तर्पण और श्राद्ध संपन्न करना चाहिए। इसके बाद गो-ग्रास देकर ब्राह्मण भोजन अवश्य कराना चाहिए। पिंडदान की क्रिया दोपहर में अधिक फलदायिनी होती है। इससे पितर प्रसन्न होते हैं और उनके आशीर्वाद से श्राद्ध करने वाले को धन-धान्य एवं पुत्र-पौत्रादि की प्राप्ति होती है। जिन लोगों की मृत्यु की तिथि ज्ञात न हो उनका श्राद्ध अमावस्या को करना चाहिए। नवमी, माता के श्राद्ध के लिए पुण्यदायी मानी गई है और शस्त्र आदि से मृत व्यक्तियों का श्राद्ध चतुर्दशी को करने का विधान है। पितृपक्ष में श्राद्ध करने वाले पुरुष और उसकी पत्नी को सात्विक आहार ग्रहण करना चाहिए। साथ ही इस दौरान नए वस्त्र, आभूषण आदि की खरीदारी और उपयोग भी वर्जित माना गया है।

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