तो क्या करना है 'राम-नाम या टें-टें', ये तय कीजिएUpdated: Mon, 10 Jul 2017 10:33 AM (IST)

हम कहते कुछ और करते कुछ हैं। ऐसे में जरूरी यह हो जाता है।

बंगाल में नदिया के राजा कृष्णचंद्र के दरबार के नवरत्नों में से थे गोपाल भांड। वह अपनी सूझ-बूझ और चतुराई से राजा सहित आम जनता की समस्याओं को सुलझाने के लिए हमेशा तैयार रहते थे। एक बार राजा कृष्णचंद्र की सभा में बाहर से आए एक पंडित आए।

वह उस समय के भारत में प्रचलित अधिकाशं भाषाएं, यहां तक कि संस्कृत, अरबी, फारसी आदि प्राचीन भाषाओं में बेहतर तरीके से बोलते हुए अपना परिचय देने लगे। पंडित जी द्वारा कई भाषाओं में बोलने पर राजा कृष्णचंद्र ने अपने दरबारियों की ओर शक भरी दृष्टि से देखा। लेकिन दरबारी यह अनुमान न लगा सके कि दरबार में पधारे पंडित जी की मातृभाषा क्या है?

राजा कृष्णचंद्र ने गोपाल भांड से पूछा, 'क्या तुम कई भाषाओं के ज्ञाता अतिथि पंडित की मातृभाषा बता सकते हो?' गोपाल भांड ने बड़ी विनम्रता के साथ कहा,' मैं तो भाषाओं का जानकार हूं नहीं, यदि मुझे अपने हिसाब से पता करने की आजादी दी जाए तो मैं यह काम कर सकता हूं।'

राजा कृष्णचंद्र ने स्वीकृति दे दी। दरबार की सभा समाप्त होने के बाद सभी दरबारी सीढ़ियों से उतर रहे थे। गोपाल भांड ने तभी अतिथि पंडित को जोर का धक्का दिया। वे अपनी मातृभाषा में गाली देते हुए नीचे आ पहुंचे।

सभी जान गए कि उनकी मातृभाषा क्या है। गोपाल भांड ने विनम्रता से कहा, 'देखिए, तोते को आप राम-राम और राधे-श्याम सिखाया करते हैं। वह भी हमेशा राम-नाम या राधे-श्याम सुनाया करता है।

लेकिन, जब बिल्ली आकर उसे दबोचना चाहती है, तो उसके मुख से टें-टें के सिवाय और कुछ नहीं निकलता। आराम के समय सब भाषाएं चल जाती हैं, किंतु आफत में मातृभाषा ही काम देती है।’ अतिथि पंडित जी बड़े लज्जित हुए।

संक्षेप में

हम कहते कुछ और करते कुछ हैं। ऐसे में जरूरी यह हो जाता है कि हमें अपने वास्तविक कार्यों पर ज्यादा गंभीर होना चाहिए। ताकि भरी महफिल में बेइज्जत होने से बच सकें।

अटपटी-चटपटी

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