जब सुख नहीं दे सकते, तो दुख क्यों देते होUpdated: Tue, 12 Jan 2016 01:07 PM (IST)

यह सब कुछ देख बच्चे डर गए। उन्हें लगा कि अब ये मुनि उन्हें भला-बुरा कहेंगे।

एक बार गौतम बुद्ध जंगल में आम के पेड़ के नीचे ध्यान मग्न थे। वहां खेल रहे कुछ बच्चों ने पेड़ से आम तोड़ने के लिए पत्थर फेंका, पत्थर तथागत यानी गौतम बुद्ध के सिर पर लग गया। उनके सिर से खून बहने लगा।

यह सब कुछ देख बच्चे डर गए। उन्हें लगा कि अब ये मुनि उन्हें भला-बुरा कहेंगे। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। वह बच्चे गौतम बुद्ध के चरणों में नतमस्तक होकर क्षमा याचना करने लगे।

उन्हीं में से एक बच्चे ने कहा, 'यह सब कुछ मेरी वजह से हुआ है। मेरी वजह से ही आपके सिर में रक्त की धारा निकल रही है। मुनिवर! मुझे क्षमा करें।'

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यह सुनकर गौतम बुद्ध बोले, 'बच्चों में इस बात से दुःखी नहीं हूं कि मेरे सिर से खून निकल रहा है। बल्कि इसलिए कि, जिस तरह पेड़ को पत्थर मारने पर वह फल देता है, ठीक वैसे ही मुझे पत्थर मारने पर में तुम्हें जब फल नहीं दे सकता तो भय क्यों दूं।'

संक्षेप में

जब हम किसी को सुख नहीं दे सकें तो हमें दुख भी नहीं देना चाहिए।

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