जब हनुमानजी से अर्जुन शर्त हार गए और चढ़ने लगे चिता परUpdated: Mon, 21 Jul 2014 11:14 AM (IST)

दोपहर को वन में स्नान करने की तैयारी करने लगे। वे धनुषकोटि में पहुंचकर घूमने लगे।

एक दिन भगवान श्रीकृष्ण को छोड़कर अकेले अर्जुन वन में विहार करने गए। घूमते-घूमते वे दक्षिण दिशा की ओर चले गए। वे अपना रथ स्वयं चला रहे थे। दोपहर को वन में स्नान करने की तैयारी करने लगे। वे धनुषकोटि में पहुंचकर घूमने लगे।

तभी उन्होंने एक विशाल वानर के रूप में हनुमानजी को बैठे देखा, जो रामनाम का जप कर रहे थे। उन्हें देखकर अर्जुन ने पूछा, हे वानर, तुम कौन हो, तुम्हारा नाम क्या है?

अर्जुन के वचन सुनकर हनुमानजी बोले , जिस राम के प्रताप से मैनें समुद्र पर सौ योजन विस्तृत सेतु बनाया था, मैं वही हनुमान हूं।

हनुमानजी के वचन सुनकर अर्जुन ने हंस कर कहा, राम ने व्यर्थ ही इतना कष्ट करके इतना बड़ा पुल बनाया। उन्होंने बाणों से ही सेतु बनाकर काम क्यों नहीं चलाया?

अर्जुन की बात सुनकर हनुमानजी ने कहा कि, हम जैसे बड़े वानरों के बोझ से वह बाण का सेतु डूब जाता। यही सोचकर उन्होंने ऐसा नहीं किया। तब अर्जुन बोले, मैं अभी एक बाणों का पुल बनाता हूं। फिर आप उस पुल पर जाकर देखिएगा, नहीं टूटेगा।

अर्जुन की बात सुनकर हनुमानजी हंसते हुए बोले, यदि मेरे पैर के अंगूठे के बोझ से आपका बनाया हुआ सेतु डूब जाए तो क्या कीजिएगा?

अर्जुन ने कहा, यदि आपके भार से सेतु डूब जाए तो मैं चिता की आग में जल जाउंगा। हनुमानजी ने कहा कि अगर अंगूठे के भार से तुम्हारा सेतु डूब जाएगा तो मैं तुम्हारे रथ के साथ तुम्हारी हमेशा सहायता करूंगा।

तब अर्जुन ने बाणों की वर्षा से पुल बना दिया। उस सेतु पर हनुमानजी ने जैसे ही अपना अंगूठा रखा तो वह डूब गया। हनुमानजी के इस कर्म से परेशान होकर अर्जुन समुद्र तट पर चिता तैयार की और हनुमानजी के रोकने पर भी वह उसमें कूदने लगे। उसी समय श्रीकृष्ण ब्रह्मचारी के रूप में प्रकट हो गए। उन्होंने अर्जुन से चिता में जाने का कारण पूछा।

उन्होंने अर्जुन की बात को ध्यान से सुना। उन्होंने कहा कि आप दोनों ने जो शर्त लगाई थी वह निर्थक हैं क्यों कि आप दोनों की शर्त का कोई साक्षी नहीं हैं।

ब्रह्मचारी की बात सुनकर दोनों ने कहा कि ठीक है, इस बार श्रीकृष्ण ने सेतु के नीचे चक्र रख दिया, जिससे हनुमानजी कुछ न कर सके, वे तुरंत समझ गए कि ब्रह्मचारी और कोई नहीं भगान श्रीकृष्ण हैं।

भगवान श्रीकृष्ण अपने वास्तविक रूप में प्रकट हुए और उन्होंने हनुमानजी को गले लगा लिया। कहते हैं उसी समय से हनुमानजी अर्जुन की ध्वजा पर विराजमान रहने लगे।

संबंधित खबरें

जरूर पढ़ें

FOLLOW US

Copyright © Naidunia.