महाभारत के इस योद्धा ने आखिरी सांस तक निभाई थी दोस्तीUpdated: Sat, 17 Oct 2015 09:33 AM (IST)

वो प्रचलित मान्यताओं के अनुसार शूद्र थे। कर्ण को इसलिए सूत-पुत्र के नाम से भी जाना जता है।

कौरवों की सेना के सेनापति कर्ण दरअसल पांडव थे। एक बार पांडवों की माता कुंती को ऋषि दुर्वासा ने एक मंत्र दिया, और कहा इस मंत्र का जाप कर जिस भी देव का स्मरण करो तो, ठीक वैसे ही पुत्र तुम्हें प्राप्त होगा। उत्सुकता वश कुंती ने उस मंत्र का जाप कर सूर्यदेव का स्मरण किया। इसके कारण उनका गर्भ ठहर गया और कर्ण का जन्म हुआ।

बिन विवाह के मां बनी कुंती ने लोकलाज के डर से उस कर्ण को एक संदूक में रखकर नदी में बहा दिया। कर्ण जब अधिरथ और उनकी पत्नी राधा को मिला तो वो बहुत खुश हुआ। वो प्रचलित मान्यताओं के अनुसार शूद्र थे। कर्ण को इसलिए सूत-पुत्र के नाम से भी जाना जता है।

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महाभारत में उल्लेख मिलता है कि कर्ण की पत्नी का नाम पद्मावती था। वृषकेतु, वृषसेन उसके पुत्र थे। कर्ण बहुत दानवीर थे। जब इंद्र ने उनसे उनके कवच कुंडल जो उनके जन्म के साथ थे उन्हें दान देने में बिल्कुल भी संकोच नहीं किया।

ये कवच, सूर्य देव ने कर्ण को दिए थे। कहते हैं यह कवच जब तक कर्ण के पास थे तब तक उसे कोई युद्ध में हरा नहीं सकता था। अपने अंतिम समय में पितामह भीष्म ने कर्ण को उनके जन्म का रहस्य बताते हुए महाभारत के युद्ध में पाण्डवों का साथ देने को कहा था।

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लेकिन कर्ण ने इसका प्रतिरोध करके अपनी सत्यनिष्ठ दोस्ती का परिचय दिया। भीष्म के अनन्तर कर्ण कौरव सेना के सेनापति नियुक्त हुए थे। आखिर में अर्जुन ने कर्ण का वध कर दिया।

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