ये हैं महाभारत के अनसुलझे रहस्यUpdated: Wed, 04 Feb 2015 12:37 PM (IST)

महाभारत के दौर में राशियां नहीं हुआ करती थीं। ज्योतिष 27 नक्षत्रों पर आधारित था, न कि 12 राशियों पर।

कहते हैं द्रोपदी पूर्व जन्‍म में शादी न होने के कारण परेशान थीं और उन्‍होने भगवान शिव की आराधना की थी। इससे भगवान शिव प्रसन्‍न हो गए थे और उन्‍होने द्रोपदी से वरदान मांगने को कहा, तो द्रोपदी ने पांच बार में अपनी मांग पूरी की और भगवान ने तथास्‍तु कह दिया।

बाद में वही पांच वरदान पांडवों के रूप में पूरे हो गए, लेकिन राजा ध्रुपद काफी परेशान थे कि ऐसा कैसे हो सकता है तो भगवान वाल्मिकी ने आकर उनको समझाया कि यह द्रोपदी के पूर्व जन्‍म का मांगा हुआ वरदान है।

अर्जुन के थे तीन नेत्र

अर्जुन के तीन नेत्र थे जिनसे वे किसी भी लक्ष्य से पार पा सकते थे। द्रोपदी के स्‍वयंवर में उन्होंने तीसरे नेत्र से ही लक्ष्य भेदा था, और वह तीसरा नेत्र दिव्य था जो किसी दूसरे को दिखाई नहीं देता था। जब द्रोपदी का स्‍वयंवर होने वाला था, तो राजा ध्रुपद अपनी पुत्री का विवाह अर्जुन से करना चाहते थे और इसीलिए उन्‍होने रणनीति के तहत मछली की आंख भेदने वाली प्रतियोगिता रखी थी।

बाद में कर्ण के आने से स्‍वंयवर में थोड़ी खींचतान हो गई, लेकिन बाद में अर्जुन ने ही प्रतियोगिता जीत ली। हालांकि, बाकी के राजाओं ने बाद में लड़ाई छेड़ दी थी, पर भगवान कृष्‍ण के बीच में हस्‍तक्षेप करने पर स्थिति नियं‍त्रण में आ गई।

भीम का हुआ सबसे पहले विवाह

भीम पहले पांडव थे जिनका विवाह सबसे पहले हुआ। दरअसल भीम का विवाह राक्षस हिडिम्‍ब की बहन हिडिम्‍बा के साथ हुआ था। राक्षस हिडिम्‍ब का वध कर देने के कारण, हिडिम्‍बा को उसके रक्षक के रूप में भीम से विवाह करना अनिवार्य था। इन दोनों की एक संतान भी हुई थी जिसका नाम घटोत्‍कच था। घटोत्‍कच का वध, महाभारत के युद्ध में हो गया था।

99 भाई, एक बहन कुल सौ कौरव

धृतराष्ट्र और गांधारी के 99 पुत्र और एक पुत्री थीं जिन्हें कौरव कहा जाता था। कुरु वंश के होने के कारण ये कौरव कहलाए। सभी कौरवों में दुर्योधन सबसे बड़ा था। गांधारी जब गर्भवती थी, तब धृतराष्ट्र ने एक दासी के साथ सहवास किया था जिसके चलते युयुत्सु नामक पुत्र का जन्म हुआ। इस तरह कौरव सौ हो गए।

यहां से आईं राशियां

महाभारत के दौर में राशियां नहीं हुआ करती थीं। ज्योतिष 27 नक्षत्रों पर आधारित था, न कि 12 राशियों पर। नक्षत्रों में पहले स्थान पर रोहिणी था, न कि अश्विनी। जैसे-जैसे समय बदला, विभिन्न सभ्यताओं ने ज्योतिष में प्रयोग किए और चंद्रमा और सूर्य के आधार पर राशियां बनाईं और लोगों का भविष्य बताना शुरू किया, जबकि वेद और महाभारत में इस तरह की विद्या का कोई उल्लेख नहीं मिलता जिससे कि यह पता चले कि ग्रह नक्षत्र व्यक्ति के जीवन को प्रभावित करते हैं।

महाभारत युद्ध में विदेशी भी

एक ओर जहां यवन देश की सेना ने युद्ध में भाग लिया था वहीं दूसरी ओर ग्रीक, रोमन, अमेरिका, मेसिडोनियन आदि योद्धाओं के लड़ाई में शामिल होने का प्रसंग आता है। इस आधार पर यह माना जाता है कि महाभारत विश्व का प्रथम विश्व युद्ध था।

वेदव्यास नाम नहीं उपाधि

वेदव्यास कोई नाम नहीं, बल्कि एक उपाधि थी, जो वेदों का ज्ञान रखने वाले लोगों को दी जाती थी। कृष्णद्वैपायन से पहले 27 वेदव्यास हो चुके थे, जबकि वे खुद 28वें वेदव्यास थे। उनका नाम कृष्णद्वैपायन इसलिए रखा गया, क्योंकि उनका रंग सांवला (कृष्ण) था और वे एक द्वीप पर जन्मे थे।

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