पौराणिक काल में थीं वानरों के पास अलौकिक शक्तियांUpdated: Tue, 17 May 2016 09:25 AM (IST)

द्वापरयुग यानी महाभारत काल में हनुमानजी का उल्लेख दो बार किया गया है।

प्रतीकात्मक छायाचित्र

त्रेतायुग में 'बंदर' इंसान की तरह ही थे। इसका सबसे विश्वसनीय प्रमाण है, 'वाल्मीकि रामायण' में मौजूद किष्किन्धाकाण्ड। इस कांड में बालि और सुग्रीव की कथा है। वहीं, भगवान शिव के रुद्रावतार हनुमानजी वानर रूप में जन्में थे।

हनुमान जी के पिता सुमेरू पर्वत पर रहते थे। वह वानरराज थे जिनका नाम राजा केसरी था। हनुमानजी की माता अंजना थीं। त्रेतायुग में अमूमन ये दो ही तथ्य मिलते हैं जिनमें राजा वानर थे। इनकी अपनी वानर सेना थी।

इन वानरों को वनचर भी बुलाया जाता था। वह इसीलिए क्योंकि यह वन में रहते थे। इंसानों की तरह बोलने वाले वानरों का जिक्र हिंदू पौराणिक ग्रंथ रामायण और महाभारत में मिलता है। ये वानर ही थे, जिन्होंने राम-रावण युद्ध में मुख्य भूमिका निभाई थी।

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द्वापरयुग यानी महाभारत काल में हनुमानजी का उल्लेख दो बार किया गया है। पहला महाभारत युद्ध में अर्जुन के रथ के झंडे पर और दूसरी बार भीम के अहंकार का अंत करने के लिए जब हनुमानजी एक वन में उनकी परीक्षा लेते हैं। उस समय तक वानर ऋषिकेश, किष्किंधा, और दारुका वन में निवास करते थे। इस बात का उल्लेख हिंदू पौराणिक ग्रंथों में मिलता है।

अलौकिक शक्ति के धनी : वानरों के पास अलौकिक शक्तियां हुआ करती थीं। रामायण में उल्लेख मिलता है कि किष्किंधा नरेश बालि अपने सामने युद्ध के लिए मौजूद व्यक्ति की आधी शक्ति को अपने अंदर समाहित कर सकता था। वहीं बालि का पुत्र अंगद एक बार जहां पैर रख देते उसे हिलाने का कोशिश कोई भी नहीं कर सकता था। वहीं, हनुमानजी की अलौकिक शक्तियों से हम सभी परिचित हैं।

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