हनुमान जी ने लंका से फेंका था यह शनि पिंड, यहां किया गया स्थापितUpdated: Sat, 08 Apr 2017 08:49 AM (IST)

लंका दहन के पश्चात शनिदेव को हनुमान जी ने मुक्त कराया था। इसके बाद शनिदेव इसी स्थान पर पहुंचे और तब से यहीं विराजमान हैं।

मुरैना। कुछ शनि मंदिर अत्यन्त प्रभावशाली हैं, जहां की गई पूजा-अर्चना का शुभ फल प्राप्त होता है। ऐसा ही एक मंदिर है, शनिश्चरा मंदिर जो ऐंती में स्थित है। ये शनिश्चरा मंदिर त्रेतायुगीन होने के कारण पूरे भारत में प्रसिद्ध है।

मुरैना जिले में स्थित इस मंदिर की ग्वालियर से दूरी मात्र 18 किलोमीटर है। माना जाता है कि यहां स्थापित शनि पिण्ड को हनुमान जी ने लंका से फेंका था, जो यहां आकर स्थापित हो गया। यहां पर अद्भुत परंपरा के चलते शनि देव को तेल अर्पित करने के बाद उनसे गले मिलने की प्रथा है।

यहां आने वाले भक्त बड़े प्रेम और उत्साह से शनि देव से गले मिलते हैं और अपने सभी दुख-दर्द उनसे सांझा करते हैं। दशर्नों के उपरांत अपने घर को जाने से पूर्व भक्त अपने पहने हुए कपड़े, चप्पल, जूते आदि को मंदिर में ही छोड़ कर जाते हैं।

भक्तों का मानना है की उनके ऐसा करने से पाप और दरिद्रता से छुटकारा मिलता है। लोगों की आस्था है कि मंदिर में शनि शक्तियों का वास है। इस अद्भुत परंपरा के चलते शनि अपने भक्तों के ऊपर आने वाले सभी संकटों को गले लगा ले लेते हैं।

इस चमत्कारिक शनि पिण्ड की उपासना करने से शीघ्र ही मनवांछित फलों की प्राप्ति होती है। कहते हैं प्राचीन शनिश्चरा धाम या शनि मंदिर मुरैना में शनिदेव जी की असली प्रतिमा स्थित है। शनि से पीड़ित हजारों लोग पूरे भारत और विदेशों से यहां आकर शनि शान्ति व दर्शन के लिए आते हैं। यह मंदिर हजारों साल पुराना है तथा शनि पर्वत पर बना हुआ है।

इस मंदिर में शनिवार को भरी भीड़ तो होती ही है, लेकिन हर शनिश्चरी अमावस्या पर लाखों श्रद्धालु भिंड, मुरैना, ग्वालियर, दतिया, झांसी, शिवपुरी, गुना, अशोकनगर सहित मध्यप्रदेश और देश के कोने-कोने से आते हैं और शनि देव का आशीर्वाद पाकर अपने को धन्य करते हैं।

कहा जाता है श्री शनिदेव को रावण ने कैद कर लिया था। लंका दहन के पश्चात श्री शनिदेव को हनुमान जी ने मुक्त कराया था। रावन की कैद से मुक्त होकर श्री शनिदेव इसी स्थान पर पहुंचे थे और तब से यहीं विराजमान हैं।

शनिश्चरा स्थित श्री शनि देव मंदिर का निर्माण राजा विक्रमादित्य ने शुरू करवाया था। मराठाओं के शासन काल में सिंधिया शासकों द्वारा इसका जीर्णोद्धार कराया गया। सन 1808 ईसवी में ग्वालियर के तत्कालीन महाराज दौलतराव सिंधिया ने यहां जागीर लगवाई।

सन् 1945 में तत्कालीन शासक जीवाजी राव सिंधिया द्वारा जागीर को जप्त कर यह देवस्थान औकाफ बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज ग्वालियर के प्रबंधन में सोंप दिया। मंदिर का स्थानीय प्रबंधन जिला प्रशासन मुरैना द्वारा किया जाता है ।

एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार- प्रसिद्ध राजनेता और महन्‍त इनकी चौखट पर मत्‍था टेकने आ चुके हैं। यहां हर शनि अमावस्‍या को मेला लगता है, जिसमें लाखों लोग इस दिन आकर आने पुराने वस्‍त्रादि छोड़ जाते हैं। यहां मुंडन करवा कर केश दान करने की भी परंपरा है।

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