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ऐसे पुत्र जिन्होंने कर दिया पिता के लिए जीवन समर्पितUpdated: Sun, 18 Jun 2017 02:15 PM (IST)

भारतीय धर्मग्रंथों में पिता और पुत्र के अनूठे रिश्ते की कई मिसालें देखने को मिलती हैं।

भारतीय धर्मग्रंथों में पिता और पुत्र के अनूठे रिश्ते की कई मिसालें देखने को मिलती हैं। हम आपको ऐसे ही पैराणिक पात्रों के बारे में बताएंगे। इनमें कुछ पुत्र तो ऐसे हुए हैं जिन्होंने अपने पिता की आज्ञा पाकर बड़े से बड़ा राज्य तिनके की तरह ठुकरा दिया।

श्रीराम - त्रेतायुग में जन्में भगवान श्रीराम अयोध्या के सिंहासन के लिए सबसे सुयोग्य उत्तराधिकारी थे। लेकिन पिता द्वारा माता कैकेयी को दिए वचन की गरिमा रखने के लिए उन्होंने 14 वर्ष का वनवास स्वीकार किया।

लवकुश - रामायण में ही पिता-पुत्र संबंधों का अनुपम उदाहरण उत्तराकाण्ड में भी मिलता है। यह उस समय की बात है जब प्रभु श्रीराम, माता सीता का त्याग कर देते हैं।

तब माता सीता वाल्मीकि आश्रम में ही लव और कुश को जन्म और उनका लालन-पालन करती हैं। इस बीच श्रीराम अश्वमेघ यज्ञ का आयोजन करते हैं।

यज्ञ का घोड़ा जब आश्रम में चला आता है, तब लव-कुश उसे बांधकर अपने ही पिता की सत्ता को चुनौती देते हैं. हालांकि तब उनको पता नहीं होता है कि श्रीराम ही उनके पिता हैं।

इस तरह लवकुश अपने पिता की शक्तिशाली सेना को परास्त कर देते हैं। इस तरह प्रकृति ही पिता और पुत्र को सामने लाती है। और दोनों ही एक दूसरे को देखकर अभिभूत हो जाते हैं।

देवव्रत - महाभारत में पितृ भक्ति का सबसे अनुपम उदाहरण मिलता है। देवव्रत हस्तिनापुर नरेश शांतनु के पराक्रमी एवं विद्वान पुत्र थे, लेकिन एक दिन की बात है शांतनु की भेंट निषाद कन्या सत्यवती से होती है और वे उस पर मोहित हो जाते हैं। वह सत्यवती के पिता से मिलते हैं और उसका हाथ मांग लेते हैं।

पिता ने शर्त रखी कि मेरी पुत्री से होने वाले पुत्र को राजसिंहासन का उत्तराधिकारी बनाएं, तभी मैं विवाह की अनुमति दे सकता हूं। शांतनु देवव्रत के साथ ऐसा अन्याय नहीं करना चाहते और कुछ कहे बिना ही लौट आते हैं। लेकिन सत्यवती के वियोग में वह गुमसुम रहने लगते हैं। स्वास्थ्य गिरने लगता है।

जब देवव्रत को पिता के दुख का कारण पता चला, तो वह सत्यवती के पिता से मिलने जा पहुंचे और उन्हें आश्वस्त किया कि शांतनु के बाद सत्यवती का पुत्र ही सम्राट बनेगा। इस तरह वह भी राज्य को तिनके की तरह ठुकरा देते हैं।

गणेश - शिवमहापुराण मे उल्लेख है एक बार स्नान के लिए जाते हुए माता पार्वती ने अपने उबटन के मैल से एक सुंदर बालक का पुतला बनाया और अपनी दिव्य शक्तियों से उस मिट्टी के पुतले को जीवन दिया। और उस बालक से कहा, जब तक मैं स्नान करके न आ जाऊं, तब तक किसी को अंदर नहीं आने देना।

बालक प्रहरी बन जाता है। थोड़ी देर बाद वहां भगवान शिव आए, जिनको अंदर जाने से बालक ने मना किया। दोनों के बीच विवाद हुआ और फिर युद्ध इस तरह भगवान शिव ने गणेश के सिर को अपने त्रिशूल से काट दिया। जब पार्वती को पता चलता है तो वे दुःखी और काफी नाराज भी हुईं।

और बालक के जन्म के बारे में बताते हुए अपने पति से उसे पुनः जीवित करने के लिए कहा। तब शिव हाथी के बच्चे का सिर बालक के धड़ पर रखकर उसे जीवित कर देते हैं और उसे गणेश नाम देते हैं।

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