वैदिक काल में नहीं था इंटरनेट फिर भी होती थी चैटिंगUpdated: Thu, 18 May 2017 10:36 AM (IST)

प्राचीन काल में लोग पेड़ों पर शब्दों को उकेर देते थे।

सोशल मीडिया की दुनिया में चैट एक ऐसा शब्द है। जो बेहद आम है, लेकिन सदियों पहले वैदिक काल में चैट होती थी। लोग आपस में चैट किया करते थे।

सदियों पहले कबूतर से संदेश भेजा जाता था। कई पौराणिक और ऐतिहासिक कहानियां में इस बात का जिक्र मिलता है। इसके लिए कबूतरों को पहले बेहतर प्रशिक्षण दिया जाता था। यहीं नहीं, वैदिक काल में पालतू जानवरों के जरिए भी बातचीत का सिलसिला जारी रहता था।

टेलीपैथी के जरिए भी लोग आपस में संवाद करते थे। इसमें दूर बैठा व्यक्ति आंख बंद कर, जिससे बात करनी है उसके मन से संपर्क करता और इस तरह मन ही मन दो लोगों की चर्चा हुआ करती थी। हालांकि यह पूरी प्रक्रिया विषय विशेषज्ञ या फिर ऋषि मुनि ही करते थे।

इसके अलावा, जानवरों पर रंगों से विशेष चिन्ह बना दिए जाते थे। और बाद में संदेश मिल जाने पर, अगला व्यक्ति ठीक कुछ इसी तरह के चिन्ह बनाकर भेजता था। यह चिन्ह ही चैट का जरिया होते थे।

पहले इशारों की भाषा में स्त्रियां बात किया करती थी। हालांकि यह प्रचलन में आज भी जारी है। प्राचीन काल में लोग पेड़ों पर शब्दों को उकेर देते थे।

यह संदेश विशेष तौर पर किसी रास्ते को बताने या किसी बात के बारे में सूचना प्रदान करने के लिए बेहतर माध्यम होते थे। ठीक इसी तरह, जब कोई राजा अपने संदेश को दूसरे राज्य भेजता था, तो अलग-अलग रंग के कपड़ों, ताम्रपत्र, ताड़पत्र या फिर झंडों में छिपाकर ले जाया करते थे।

तो वहीं, दूसरे राज्य में जब कोई गुप्तचर भेजा जाता तो उसे आड़ी-तिरछी रेखाओं में संदेश भेजा जाता था। जो सिर्फ विषय विशेषज्ञ ही पढ़ सकता था।

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