जिंदगी में कुछ इस तरह तलाशें शांति, मिलेगा संतोषUpdated: Sat, 08 Jul 2017 06:06 PM (IST)

कभी भी परिस्थितियां हमारी असफलता के लिए जिम्मेदार नहीं होती हैं।

- स्वामी सुखबोधानंद

आपका मन ही आपके भीतर स्वर्ग या नरक रचता है। यह सब इस पर निर्भर करता है कि आप अपने दिमाग का उपयोग कैसे करते हैं। आपको अपने भीतर करुणा की जगह बढ़ाने का प्रयास करना चाहिए तब हम ज्यादा बेहतर जीवन जी पाएंगे।

हमारे जीवन का उद्देश्य सिर्फ दिन काटना नहीं है बल्कि आत्मशांति की खोज है। जब आपके जीवन में संतोष होगा तो आप असफलताओं से आहत नहीं होंगे। जब आप दूसरों के साथ तुलना करते हैं तो आपको अपना कद हमेशा छोटा ही नजर आता है क्योंकि कोई न कोई ऐसा व्यक्ति मिल ही जाता है जो आपसे दौड़ में आगे खड़ा होता है।

खेल की दुनिया में भी जो रेकॉर्ड्स बने हैं वे एक न एक दिन टूटेंगे ही। इसलिए तुलना ऐसी चीज है जो आपको असफलता के रास्ते पर ले जाती है लेकिन तरक्की की तरफ बढ़ने का रास्ता भी यही है। लेकिन सच्ची तरक्की ता यही है कि आपको अपने भीतर संतोष हो कि आपने अच्छा काम किया।

कभी भी परिस्थितियां हमारी असफलता के लिए जिम्मेदार नहीं होती हैं। हमारा दिमाग या मन ही असफलता के लिए जिम्मेदार होता है। जब किसी भी स्थिति हमारे मन में यह भाव रहता है कि हम असफल हो गए तो समझिए कि आप असफल हुए वरना तो आप जहां भी हैं वही आपकी सफलता है। असल में मन बंधन या आजादी को जन्म नहीं देता है बल्कि वह तो एक बर्तन है जिसमें आप जो भी डालेंगे वह उसी तरह से उस पर काम करना शुरू कर देगा।

आपका मन ही आपके भीतर स्वर्ग या नरक रचता है। यह सब इस पर निर्भर करता है कि आप अपने दिमाग का उपयोग कैसे करते हैं। उदाहरण के लिए एक चाकू खतरनाक नहीं होता है लेकिन अगर आप गलत ढंग से इसका उपयोग करते हैं तो वह खतरनाक है और अगर समझदारी से उपयोग करते हैं तो वह उपयोगी है। अगर आप मन को भी इसी तरह गलत दिशा में लगाते हैं तो दुख ही पैदा होगा लेकिन अगर आप मन को सही दिशा में ले जाते हैं आपका जीवन बेहतर होगा।

हर व्यक्ति को अपने मन को साधने के प्रति सतर्क रहना चाहिए। सोचिए अगर आपका सामना गुस्से से होता है तो आप भी गुस्से में आ जाते हैं तो इसका मतलब है कि अभी आपको अपने मन को साधने की बहुत जरूरत है। अगर आप चीजों को करुणा से देखते हैं तो मानिए कि आपने चीजों में सुधार कर लिया है।

जब तक आपका मन चीजों का ठीक से सामना करना नहीं सीखता है तब तक उलझने बनी ही रहेंगी। तब तक आप अनुभवी नहीं कहलाएंगे।

आखिर अनुभव है क्या? किसी भी चुनौती के सामने पेश आने का तरीका ही तो अनुभव है। किसी भी परिस्थिति का मुकाबला आप अपने विचार से करते हैं और इस पर पूर्व में आपके साथ घटी घटनाओं का बड़ा असर होता है।

इसलिए जब आप पुरानी घटनाओं के आधार पर ही भविष्य में भी व्यवहार करते हैं तो आप कुछ भी नया नहीं सीखते हैं। बीते अनुभवों से सीख लें लेकिन करुणा और दूसरों के प्रति सौजन्य दिखाने से खुद को वंचित न रखें।

मैनेजमेंट में कहा जाता है 'आउट ऑफ बॉक्स थिंकिंग" यानी अगर कोई व्यक्ति पूर्व में जिस ढर्रे पर सोच रहा था उसी तरह से सोचेगा तो वह नई राह कैसे तलाश पाएगा।

अगर वह लीक से अलग ढंग से सोचेगा तभी तो उसे विचार मिलेंगे। इस 'आउट ऑफ बॉक्स थिंकिंग" को हम जीवन पर भी लागू कर सकते हैं।

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