कोई गुस्सा करे, तो उसे मनाने का ये है आसान तरीकाUpdated: Sat, 17 Jun 2017 12:49 PM (IST)

तो हम दरवाजे को खोलते हैं ताकि प्रभु-प्रेम हम में से प्रवाहित हो।

- संत राजिन्दर सिंह जी महाराज

क्रोध से प्रतिक्रिया करने में बहुत ऊर्जा खर्च होती है। ऐसी प्रतिक्रिया हमें क्षीण, शक्ति हीनकर देती है पर अगर हम अपनी ऊर्जा प्रेममयी प्रतिक्रिया में लगाएंगे तो उससे न सिर्फ हम परिस्थिति में समन्वय ले आएंगे बल्कि स्वयं भी उस प्रेम से ऊर्जा पाएंगे।

एक बार किसी ने मदर टेरेसा से पूछा, ‘क्या आपको चारों ओर फैले सामाजिक अन्याय के अनेक उदाहरणों को देखकर क्रोध नहीं आता?’ मदर टेरेसा ने बहुत सुंदर उत्तर दिया, ‘मैं अपनी शक्ति को क्रोध में क्यों खर्च करूं, जबकि मैं इसे प्रेम में खर्च कर सकती हूं?’

मदर टेरेसा की यह प्रतिक्रिया एक उच्च दृष्टिकोण दर्शाती है जो हम भी जीवन में अपना सकते हैं। प्रतिदिन, हम अनेक परिस्थितियां पाते हैं,जिनसे क्रोध भडक़ सकता है। कभी-कभी हम तब क्रोधित होते हैं, जब कोई हमें चोट पहुंचाता है या हमें नाराज करता है।

ऐसे भी उदाहरण हैं, जिनमें दूसरों को चोट पहुंचते हुए देखकर हमें क्रोध आ जाता है। हमें सामाजिक अन्याय के मामले भी मिल सकते हैं, जिनमें समाज में व्यक्तियों का एक समूह अन्याय सह रहा होता है। इन सभी मामलों में, हमें लग सकता है कि कुछ गलत हो रहा है।

हो सकता है किजो कुछ घट रहा है, उसे हम अनदेखा न कर पाएं। फर्क इस बात में है कि हम अन्याय के प्रति किस प्रकार प्रतिक्रिया करते हैं? हम फैसला करने की क्षमता रखते हैं। हम क्रोध से

प्रतिक्रिया कर सकते हैं या हम क्रोध को काबूकर, उसे प्रेम में बदल सकते हैं। मदर टेरेसा ने क्रोध को प्रेम से काबू करने का फैसला किया था।

संसार में क्रोध और हिंसा भरे पड़े हैं। हर गांव और शहर में, हर घर में हम क्रोध का विस्फोट होते देखते हैं। इस क्रोध के बदले, और क्रोध करने से आग में घी डालने का ही काम होता है। हम आग पर पंखा करके आग को नहीं बुझा सकते हैं।

हमें आग को (पानी से) बुझाना होगा। ऐसे ही, हम क्रोध की आग को, आग से नहीं शांत कर सकते. हम क्रोधकी आग को प्रेम से शांत कर सकते हैं. किसी झगड़े के दौरान, क्रोध भरी आवाज में बोलने के बजाय, हमें मिठास का मरहम लगाना चाहिए ताकि दूसरों का गुस्सा ठंडा पड़ जाए।

वातावरण में क्रोध-भरे विचारों की तरंगों को बढ़ावा देने के बजाय, हम प्रेम-भरे विचारों को प्रसारित करें ताकि वातावरण साफ हो जाए। क्रोध से प्रतिक्रिया करने में बहुत ऊर्जा खर्च होती है। ऐसी प्रतिक्रिया हमें क्षीण, शक्तिहीन कर देती है, पर अगर हम अपनी ऊर्जा प्रेममयी प्रतिक्रिया में लगाएंगे तो उससे न सिर्फ हम परिस्थिति में समन्वय ले आएंगे बल्कि स्वयं भी उस प्रेम से ऊर्जा पाएंगे।

जब हम प्रेम से व्यवहार करते हैं तो हम दरवाजे को खोलते हैं ताकि प्रभु-प्रेम हम में से प्रवाहित हो। अगली बार जब हम अपने आपको ऐसे माहौल में पाएं जहां अन्याय हो रहा हो तो हम क्रोध की बजाय, प्रेम से प्रतिक्रिया करने की कोशिश करें।

हम अपनी सकारात्मक प्रतिक्रि याका, उस माहौल पर औरअपने आप पर, दोनोंपर हुए असर को देख सकते हैं। संसार में बहुतक्रोध विद्यमान है. आओ, हम संसार में समन्वयऔर शांति लाएं। आओ, हम क्रोध को प्रेम सेजीत लें। हम देखेंगे कि हमारा ऐसाकृत्य, एकतरंग के जैसे, औरों तक पहुंचेगा और वह दिनदूर नहीं होगा, जब हमारा वातावरण, हमारासमाज और हमारा समुदाय, इस संसार में शांतिका आश्रय बन जाएगा।

मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है क्रोध : मानवीय आचरण के लिए क्रोध को सर्वथा ही गलत बताया गया है। क्रोध को मनुष्य का शत्रु माना जाता है क्योंकि इस अवस्था में मनुष्य कीसोचने-समझने की शक्ति क्षीण हो जाती है। दूसरों कीतर्कसंगत बातभी उस समय गलत प्रतीत होती है, लिहाजा क्रोध से दूरी बनाए रखनाजरूरी है. अगर हम ऐसी परिस्थिति में थोड़ा धैर्य से काम लें, तो कईजटिल मुश्किलों को दूर कर सकते हैं.

अटपटी-चटपटी

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