हमेशा मांगते रहोगे, तो सम्मान कहां से पाओगे!Updated: Thu, 16 Mar 2017 12:36 PM (IST)

अपना गुस्सा, कुंठा, बुरी भावनाएं, अच्छी भावनाएं सब कुछ गुरु को अर्पण कर दो

- श्री श्री रविशंकर

अधिकार जताने की चाह के कारण अधिकतर आपके संबंध भी पूर्णत: विकसित नहीं हो पाते. हम मांगना शुरू कर देते हैं. संबंधों में लोग अधिकांशत: कहते हैं ‘मैंने तो आपके लिए इतना किया है- बदले में आपने मेरे लिए क्या किया?’ संबंध को बनाए रखने के लिए उसमें सम्मान का होना आवश्यक है।

सम्मान करना दिव्य प्रेम का लक्षण है. इसी सम्मान को पूजा कहते हैं. पूजा से भक्ति पनपती है. जो कुछ प्रकृति हमारे लिए करती है उसी की नकल हम पूजा की विधि में करते हैं. परमात्मा भिन्न-भिन्न रूपों में हमारी पूजा कर रहा है. हम पूजा द्वारा वह सब ईश्वर को वापस अर्पित करते हैं.

परमात्मा हमें हरेक मौसम में तरह-तरहके फल देते हैं- हम फलों को उन्हें अर्पित करते हैं, प्रकृति हमें भोजन देती है हम बदले में भगवान को अनाज चढ़ाते हैं. इसी तरह प्रकृति में चांद व सूरज रोज उदय और अस्त होकर हमें लगातार प्रकाश देते हैं- उसी की नकल करके हम कपूर व दीपक की आरती करते हैं.

सुगंध के लिए धूप जलाते हैं. पूजा में पांचों इंद्रियों का पूरे भाव से प्रयोग करते हैं. पूर्ण कृतज्ञता और सम्मान भाव ही अर्चना है. आप ने बच्चों को देखा होगा- वह अपने छोटे-छोटे बर्तनों से खेलते हैं और चाय व रोटी बनाते हैं और मां के पास आकर बोलते हैं, ‘मां आप चाय पीजिए’ वह खाली कप से भी ऐसे कल्पना करते हैं, जैसे सचमुच चाय पी रहे हैं.

वह आप के साथ खेल खेलते हैं. जैसा आप उनके साथ करते हैं, वह भी वैसा ही आपके साथ करते हैं. कभी वह गुडिय़ा को सुलाते हैं, खाना खिलाते हैं, नहलाते हैं. पूजा में हम ईश्वरके साथ वही करते हैं जो ईश्वर हमारे साथ कररहा है. पूजा नकल, सम्मान, खेल, प्रेम सबका सम्मिश्रण है.

हम जिस से प्रेम करते हैं उसको पाना चाहते हैं. पाने की चाह उस सुंदर वस्तु को कुरूप कर देती है. पूजा में इसके विपरीत होता है. पूजा में आदर, सम्मान के साथ स्वयं समर्पित हो जाते हैं और आप सुंदरता को पहचान कर उपासना व प्रशंसा करते हो. अधिकार जताने के ठीक विपरीत हम पूजा में अर्पण करना चाहते हैं.

अधिकार जताने की चाह के कारण अधिकतर आपके संबंध भी पूर्णत: विकसित नहीं हो पाते. हम मांगना शुरू कर देते हैं. संबंधों में लोग अधिकांशत: कहते हैं ‘मैंने तो आपके लिए इतना किया है- बदले में आपने मेरे लिए क्या किया?’

मांग, सम्मान करने के विपरीत है. संबंध को बनाए रखने के लिए उसमें सम्मान का होना आवश्यक है. क्या आपने ऐसा कभी सोचा है कि पेड़ आपके हैं? सूरज, चांद, वायु, जल, पृथ्वी सब आपके हैं? तारे-सितारे आपके हैं? सारे व्यक्ति आपके हैं? अगर सृष्टि का सम्मान करेंगे तो यह अनुभव करेंगे कि यह सभी आपके हैं.

अपने शरीर का सम्मान करो. खाना ऐसे खाओ जैसे भोग लगा रहे हो. बिना ईश्वरीय भक्ति के जीवन में बेचैनी सी बनी रहती है. पूजा द्वारा यही ज्वर प्रेम में परिणीत हो जाता है. भक्ति में तपने से ईश्वर के प्रति तड़प भी पैदा होगी. प्रेम के साथ तड़प होना स्वाभाविक है.

जहां तड़प है वहां जानलो कि प्रेम भी है. वे एक ही सिक्के के दोपहलु हैं- उन्हें अलग नहीं करा जा सकता. ज्यादातर मिलने की तड़प होने पर हम उसे समाप्त करने की जल्दबाजी में रहते हैं. परभक्ति की पराकाष्ठा में यह सारा ज्वर ईश्वरीय प्रेम में परिवर्तित हो जाएगा.

सब कुछ अर्पण कर तुम मुक्त हो जाते हो

तुम्हें अपने किसी विकार के प्रति या किसी बुरे कृत्य के प्रतिबुरा लगता है. गुरु वह है, जो तुम्हारे ऐसे सारे बोझ उठा लेते हैं जिन्हें तुम स्वयं नहीं उठा पाते और तुम्हारे अंदर भक्ति की लौजला देते हैं.

अपना गुस्सा, कुंठा, बुरी भावनाएं, अच्छी भावनाएं सब कुछ गुरु को अर्पण कर दो. तुम्हारी नकारात्मकता तुम्हें नीचे खींच लाती है. सब कुछ अर्पण करके तुम मुक्त हो जाते हो.

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