एक तराजू पर तौले जाते हैं मजदूर और कलाकर: पंडीरामUpdated: Mon, 01 Sep 2014 12:08 AM (IST)

काष्ठशिल्पी पंडीराम मंडावी को अफसोस है कि छत्तीसगढ़ में मजदूर और कलाकार को एक ही तराजू में तौला जाता है।

मो. इमरान खान, नारायणपुर। इटली और रूस में बस्तर आर्ट का झंडा गाड़ चुके नामी काष्ठशिल्पी पंडीराम मंडावी को अफसोस है कि छत्तीसगढ़ में मजदूर और कलाकार को एक ही तराजू में तौला जाता है। उन्हें रूस और इटली ही नहीं बल्कि देश के विभिन्न प्रदेशों में सम्मान मिल चुका है लेकिन छत्तीसगढ़ में उन्हें स्तरीय सम्मान नहीं मिला है और ना ही उन्हें इसकी अपेक्षा है।

जिले के गढ़बेंगाल गांव के काष्ठशिल्पी पंडीराम मंडावी (52) 1999 और 2007 में इटली गए थे। वहां उन्होंने अपनी कला दिखाई। वे 2006 में मास्को, रूस गए थे। वे बताते हैं कि विदेशों में कला को काफी सम्मान मिलता है। छत्तीसगढ़ में ना तो नई पीढ़ी में कला को लेकर दिलचस्पी है और ना ही अफसर-नेताओं को। युवा सीखना नहीं चाहते हैं।

इटली से कोण्‍डगांव आई थी महि‍ला

इसके उलट विदेशों में युवा इसकी ओर आकर्षित होते हैं। वे बताते हैं कि इटली से एक महिला 1999 में कोण्डागांव आई थी। वह यहां से उसके काष्ठ शिल्प लेकर इटली गई और सामग्रियों को बेचा। विदेशी महिला ने उसे इटली आमंत्रित किया। वहां वह छोटे काष्ठ शिल्प लेकर गया। वहां उसके शिल्प की अच्छी मांग थी। महुआ की लकड़ी से बनाई गई एक कंघी उसने भारतीय मुद्रा के हिसाब से तब 1200 रुपए में बेची। ये हाथों-हाथ बिक गई। केंद्र सरकार की ओर से उसे 2007 में एक बार फिर इटली भेजा गया। कोलकाता की एक प्राइवेट संस्था की ओर से उसे 2006 में मास्को, रूस भेजा गया था।

उसने वहां प्रदर्शनी में अपने उत्पाद बेचे। यहां इन उत्पादों की अच्छी डिमाण्ड थी। उसे केरल के कोच्ची शहर में एक समारोह में डॉ स्वामीनाथन पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उसे एक लाख रुपए नगद और प्रशस्ति पत्र मिला। कर्नाटक, नई दिल्ली, राजस्थान, मप्र, महाराष्ट्र एवं देश के कई प्रदेशों में उसने अपना हुनर दिखाया। हाल ही में उसे भारतीय ललित कला अकादमी की ओर से नई दिल्ली आमंत्रित किया गया था। टाटा की ओर से रायपुर में भी एक प्रदर्शनी में शामिल हुआ था। वह बताता है कि छत्तीसगढ़ में कलाकार को मजदूर समझा जाता है।

कलाकारों की कद्र अन्य राज्यों में है। उसके गांव से रायपुर तक कार से उसे ले जाया जाता है और अन्य शहरों तक जाने के लिए प्लेन का टिकट दिया जाता है। एक दिन में उसे पांच हजार रुपए दिए जाते हैं। प्रायोजक संस्था की ओर से बड़े होटलों में रहने और खाने-पीने का खर्च उठाया जाता है। वह बताता है कि उसके गांव में भी युवाओं को उसने काष्ठ शिल्प सिखाने की कोशिश की लेकिन उनमें दिलचस्पी नहीं दिखी। उसकी कला के वारिस के सवाल पर वह कहता है कि उसका छोटा बेटा बलदेव नवीं में पढ़ता है। वह इसे सीख रहा है। बड़ा बेटा बुधसिंह मण्डावी शिक्षक है।

विदेश में ये अच्छा नहीं लगा

रूस और इटली में कई दिनों तक रह चुके पंडीराम को एक बात अच्छी नहीं लगी। वह कहता है कि वहां विवाह बड़े अजीब होते हैं। एक जोड़ा एक साथ जिंदगीभर के लिए नहीं रहता है। विवाह के कुछ दिन बाद पत्नी-पत्नी अलग हो जाते हैं। फिर वे दूसरे से विवाह रचा लेते हैं। पंडीराम को वहां की साफ सफाई अच्छी लगी। वह कहता है कि वहां गंदगी दिखती ही नहीं है।

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