सीरिया शरणार्थी संकट : जिंदगी की शरण के लिए मौत से आंख मिचौलीUpdated: Thu, 03 Sep 2015 04:04 PM (IST)

एक तरफ सत्ता से बेदखल किए गए पूर्व राष्ट्रपति असद की सेना है तो दूसरी तरफ आतंकियों से समर्थन प्राप्त विद्रोहियों की सेना।

सीरियाई नागरिकों ने अपने मुल्क में सुखद बदलाव के लिए आवाज बुलंद की थी, लेकिन यह आंदोलन राह से ऐसा भटका कि आज वहां के बाशिंदों को दुनिया के सबसे बड़े शरणार्थी संकट का सामना करना पड़ रहा है।

एक तरफ सत्ता से बेदखल किए गए पूर्व राष्ट्रपति असद की सेना है तो दूसरी तरफ आतंकियों से समर्थन प्राप्त विद्रोहियों की सेना। निर्दोष नागरिकों के लिए एक-तरफ कुआं है तो दूसरी तरफ खाई। आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट (आईएस) का भी खौफ बढ़ता जा रहा है। मजबूर नागरिकों को पड़ोसी मुल्कों की ओर भागना पड़ रहा है। एक नजर सीरिया से जिंदगी के लिए भागने को मजबूर लोगों की मौत से आंख-मिचौली के हालात पर -

  • यूं शुरू हुआ था संकट : इस संकट की शुरुआत मार्च 2011 से हुई थी। राष्ट्रपति बशर-अल-असद 1971 से सत्ता पर काबिज थे। लोग चाहते थे वे कुर्सी छोड़ दें, लेकिन वे तानाशाही पर उतर आए तो शांतिपूर्ण प्रदर्शनों ने हिंसक रूप ले लिया। सरकार ने सख्ती दिखाई तो विरोधी गुट भी हथियार लेकर सामने आ गया। सरकार विरोधियों को कई आतंकी संगठनों ने समर्थन करना शुरू कर दिया। आज लड़ाई चरम पर पहुंच गई है।
  • ताजा हालात : चार साल से चल रहा गृह युद्ध अब तक दो लाख 20 हजार लोगों की मौत का कारण बन चुका है। इनमें से आधे निर्दोष नागरिक हैं। हमेशा लोगों की चहल-पहल से जीवंत नजर आने वाले शहर बमबारी से मुर्दा हो गए हैं। मानवाधिकारों का हनन हो रहा है। खाने-पीने की चीजों और चिकित्सा समेत तमाम जरूरी सुविधाओं की व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त है।
  • हर रोज हजारों का पलायन : हर रोज हजारों लोग पलायन करने को मजबूर हैं। आमतौर पर अपने शहर में बमबारी शुरू होने या परिजन के मारे जाने के बाद लोग मुल्क छोड़ने को मजबूर हो रहे हैं। लोग तुर्की, इराक, जॉर्डन, लेबनान और इजिप्ट जाने को मजबूर हैं।
  • भागने के तीन रास्ते : तुर्की, इराक, जॉर्डन, लेबनान और इजिप्ट की सीमाएं सीरिया से जुड़ी हैं। बड़ी संख्या में लोग तुर्की का रुख कर रहे हैं, क्योंकि वहां से यूरोपीय देशों में जा सकते हैं। इसके बाद इजिप्ट का नंबर आता है। तीसरा रास्ता लेबनॉन और जॉर्डन का है, जहां की सरकारों ने अपनी सीमाओं पर शांति सेना तैनात कर शरणार्थियों की मदद कर रही है। हालांकि, इन दोनों देशों की अपनी मजबूरियां हैं। इराक ने शुरू में अपनी सीमाएं खोली थीं, लेकिन भारी संख्या में शरणार्थियों के पहुंचने पर उसे सील कर दिया। हंगरी में सैकड़ों शरणार्थी जर्मनी जाने के इंतजार में
  • बॉर्डर तक जाना भी मौत से लड़ने के समान : लोगों के लिए अपने शहर से निकलकर नजदीकी पड़ोसी देश की सीमा तक जाना भी जोखिम भरा है। मासूम बच्चों और महिलाओं के साथ परिवार सैकड़ों किमी पैदल चलने को मजबूर हैं। सरकार से समर्थन प्राप्त सेना और विद्रोही गुटों से बचना मुश्‍िकल है।
  • सबसे बड़ा शरणार्थी कैम्प : जुलाई 2012 में जॉर्डन में पहला आधिकारिक शरणार्थी कैम्प खोला गया था। आज वहां 81 हजार 500 सीरियाई रह रहे हैं। एक तरह से यह कैम्प देश का चौथा सबसे बड़ा शहर बन गया है। यहां अस्थाई टेंट लगे हैं। खेल के मैदान और स्कूल भी हैं। अप्रैल 2014 में एक और कैम्प अजराक खोल गया था। वहां सुपरमार्केट भी है।
  • दुनिया को रुलाने वाली तस्वीर की कहानी

  • आपस में उलझ रहे यूरोपीय देश : यूरोपीय देशों में भी सीरियाई शरणार्थियों का दबाव साफ दिखाई दे रहा है। तुर्की से निकलकर बड़ी संख्या में लोग जर्मनी का रुख कर रहे हैं। एक आंकड़े के मुताबिक, हर घंटे 109 लोग गैरकानूनी तरीके से जर्मनी में प्रवेश कर रहे हैं। तीन हजार 709 लोग हंगरी और ऑस्ट्रिया के रेलमार्ग के रास्से जर्मनी पहुंच चुके हैं। हालांकि, जर्मनी ने अब तक नर्म रुख अपनाया है, लेकिन अन्य यूरोपीय यूनियन में शामिल अन्य देश उसका विरोध कर रहे हैं। यही स्थिति ब्रिटेन की भी है।
  • 1.10 करोड़ से नागरिकों को अपने घर छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा है।
  • 40 लाख शरणार्थी सीरिया के पांच पड़ोसी देश में पनाह लिए हुए हैं।

कहां कितने शरणार्थी

तुर्की 16.22 लाख

इराक 2.24 लाख

लेबनान 11.74 लाख

जॉर्डन 6.23 लाख

इजिप्ट 1.36 लाख

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