इतिहास में गुम कल्चुरी वंश की राजधानी तुमानUpdated: Sat, 17 Jan 2015 08:10 AM (IST)

छत्तीसगढ़ के एक हजार साल पुराने इतिहास को समेटे पुरातात्विक धरोहर बिखरते जा रहे हैं।

कोरबा (निप्र)। छत्तीसगढ़ के एक हजार साल पुराने इतिहास को समेटे पुरातात्विक धरोहर बिखरते जा रहे हैं। इन्हीं में से एक महान विरासत को प्रदर्शित करता ऐतिहासिक ग्राम तुमान भी है। तुमान 10वीं व 11वीं शताब्दी में कल्चुरी वंश के शासकों की राजधानी रही है। यहां प्राचीनकाल में निर्मित मंदिरों की सुरक्षा व संरक्षण के प्रति प्रशासन गंभीर दिखाई नहीं दे रहा। कल्चुरी वंश के राजाओं द्वारा निर्मित इन ऐतिहासिक मंदिरों व मूर्तियों के क्षरण के साथ उनमें गढ़ी गई प्राचीन संस्कृति भी इतिहास में गुम होते जा रही है।

कई पुरातात्विक मंदिरों को खोजा

पुरातात्विक ग्राम तुमान जिला मुख्यालय से लगभग 60 किलोमीटर की दूरी पर कटघोरा-पेंड्रारोड राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित है। कल्चुरी वंश के शासकों द्वारा 10वीं से 11वीं शताब्दी के बीच निर्मित यहां कई पुरातात्विक मंदिरों को खोजा गया है। पौराणिक महत्व के साथ राज्य की सांस्कृतिक विरासत को संजोए इन पुरातन धरोहरों को सहेजने की कवायद में प्रशासन रूचि नहीं ले रहा। इन ऐतिहासिक मंदिरों व मूर्तियों का अस्तित्व खतरें में पड़ता देख शासन के निर्देश पर राज्य पुरातत्व विभाग ने तुमान के आसपास बड़े निर्माण कार्य व खुदाई पर प्रतिबंध लगाया था।

बावजूद इसके स्थानीय विभाग के उदासीन रवैये की वजह से इस अनमोल खजाने को बिखरते देखा जा रहा है। सुरक्षा के नाम पर इस क्षेत्र को चारदीवारी से घेर दिया गया है तथा एक चौकीदार की नियुक्ति भी कर दी गई है। बावजूद इसके जिन शिलाओं का इस्तेमाल कर मंदिर व मूर्तियां बनाई गई थी, वे मौसम में परिवर्तन के साथ साल दर साल क्षतिग्र्रस्त होते जा रहे हैं। 10वीं शताब्दी में कल्चुरी शासन के दौरान रहे शिल्प कलाकारों द्वारा बेजान पत्थरों में गढ़ी गई कलाकृतियों के अवशेष जीवित रखने लापरवाही बरती जा रही है।

तुमान का किया विस्‍तार

इस क्षेत्र के जमींदार टीकमदेव ठाकुर ने बताया कि वर्ष 1015 से 1045 ईसवी शताब्दी में राज्य के विभिन्न जिलों में राजा पृथ्वीदेव ने आधिपत्य कायम किया था। उन्हीं के शासनकाल में तुमान को छत्तीसगढ़ के विभिन्न जिलों में फैले कल्चुरी साम्राज्य की राजधानी के तौर पर विकसित करते हुए विभिन्न निर्माण कार्य कराए गए। चारों ओर से पहाड़ियों व घने जंगलों से घिरे तुमान में मंदिरों, मूर्तियों व तारण ताल का निर्माण कराया गया।

राजा पृथ्वीदेव ने उत्कल नरेश को हराकर उनके साम्राज्य पर कब्जा किया था। पृथ्वीदेव पेंड्रा के शासक को हराकर तुमान पहुंचे थे। इसके बाद तुमान की ऐतिहासिक विरासत का विस्तार किया गया। जिसे आज हम पुरातात्विक अवशेषों के रूप में उन मंदिरों व मूर्तियों में देख रहे हैं। पृथ्वीदेव जब पेंड्रा फतह कर तुमान की ओर आए तब इन गढ़ों में दामा व दुरहा भाईयों का राज था, जिन्हें हराकर उन्होंने गढ़ पर कब्जा किया।

21 मंदिरों के अवशेष आज भी मौजूद

राजा पृथ्वीदेव के शासनकाल में तुमान समेत कोरबा जिले के अनेक क्षेत्रों में मंदिरों व मूर्तियों का निर्माण कराया गया था। केवल तुमान में ही अलग-अलग हिंदू देवी-देवताओं के अनेक मंदिर बनवाए गए थे। इनमें से ज्यादातर मंदिर व उनमें ढूंढ़ी गई पौराणिक मूर्तियां भगवान ब्रम्हा, विष्णु व शंकर की हैं। वर्तमान स्थिति में 21 मंदिरों के अवशेष आज भी देखे जा सकते हैं। इनके अलावा शेष कलाकृतियां अब खुद इतिहास की गर्त में खो चुके हैं।

राजा पृथ्वीराज के शासनकाल में राजधानी तुमान के अधीन विभिन्न गढ़ों से लगान की वसूली की जाती थी। इसके लिए नियुक्त किए गए जमींदार जिले के तुमान, लाफा, पोड़ी, कोरबा, पाली, रतनपुर व चांपा गढ़ से लगान वसूली किया करते थे। इस काल में राजाओं को धार्मिक अनुष्ठान के लिए मंदिरों व निस्तारी की जरूरत के मद्देनजर जलाशय निर्माण कराया गया। खुदाई के दौरान गांव में 21 मंदिरों व 126 में मात्र 10 जलाशयों के अवशेष बचे हैं।

तुमान के ऐतिहासिक मंदिरों की देखरेख पुरातत्व विभाग ने अपने हाथ में ले ली है, लेकिन जिस तरीके से संरक्षण होना चाहिए, वैसा नहीं हो रहा। जीर्णशीर्ण होते जा रहे मंदिरों का रखरखाव जिनके हाथों में दिया गया है, वे भी अकुशल हैं। एक ओर राज्य की पहली राजधानी होने का गौरव के बाद भी तुमान को एक पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित करने पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है।

पहुंच मार्ग इतना मुश्किल है, जिसे देखकर लोग यहां आने से कतराते हैं। बहुत कम संख्या में पहुंच रहे पर्यटकों को भी गड्ढों भरी सड़क से होकर यहां पहुंचना पड़ता है। यहां का प्रमुख मंदिर भगवान शिव का है। शिवरात्रि में यहां हर साल भव्य मेले का आयोजन किया जाता है। जहां आसपास के कई गांव के लोग पहुंचकर सेवा देते हैं। इस मेले में शामिल होने कोरबा के अलावा राज्य के अन्य जिलों से लोग भी पहुंचते हैं। बावजूद इसके तुमान को बेहतर पर्यटन केंद्र के रूप में प्रसिद्धि दिलाने प्रयास नहीं किया जा रहा है।

वैज्ञानिक अनुवीक्षण के दौरान पुरातत्व विभाग में यहां मंदिरों की अवशेष खोजे। यहां निर्मित कलाकृतियां में बलुवा पत्थर का इस्तेमाल किया गया है। सदियों पुराने निर्माण में यहां का एकमात्र शिव मंदिर ही अपने पूर्ण स्वरूप में यथावत है। लगभग एक एकड़ के भू-भाग में यहां 21 मंदिरों का निर्माण कराया गया था, इनमें शेष मंदिर टूट-फूट गए हैं। 5 वर्ष पहले मंदिर का जीर्णोद्धार ठेके पर दे दिया गया है।

जिनके द्वारा पुरातात्विक शिलाओं का केमिकल ट्रीटमेंट किया जा रहा है, वे भी अकुशल हैं। इस संबंध में पुरातत्व वैज्ञानिकों की मानें तो सदियों वर्ष पुराने शिलाओं पर उकेरी गई कृतियां बहुत नाजुक होती हैं। इन पत्थरों पर जमी काई या धूल को साफ करने कितने मात्रा में रसायनों का संतुलित प्रयोग करना हैं, यह विशेषज्ञों को ही पता रहता है। ऐसे में अगर इन पुरातात्विक कलाकृतियों का जीर्णोद्धार मजदूरों के भरोसे छोड़ दिया गया, तो वे संरक्षित होने की बजाय नष्ट हो जाएंगे।

1015 से 1045 ईसवीं शताब्दी में राजा पृथ्वीदेव ने अपने शासनकाल में तुमान के इन मंदिरों का निर्माण कराया था। भारतीय पुरातत्व एवं सर्वेक्षण विभाग द्वारा मूर्तियों का रासायनिक उपचार किया गया है, जो अच्छी स्थिति में है। अनुरक्षण कार्य में विशेषज्ञों की उपस्थिति में होती तो ज्यादा बेहरत होता। उत्खनन करवाकर छुपे इतिहास को बाहर लाता, तो कल्चुरी काल से पूर्व यहां किन-किन राजवंशों का शासन रहा, यह महत्वपूर्ण इतिहास बाहर आता। इस दिशा में शासन-प्रशासन को पहल करनी चाहिए। मुख्य मंदिर व पुरातात्विक क्षेत्र की सुरक्षा के लिए चारदीवारी बनाई गई है व केयरटेकरों की नियुक्ति की गई है। - हरीसिंह क्षत्रिय, मार्गदर्शक, पुरातत्व विभाग

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