उज्जैन की लालपुल मस्जिद में इंसानियत का सिंहस्थUpdated: Fri, 13 May 2016 06:20 PM (IST)

लालपुल मस्जिद में लगे इंसानियत के इस सिंहस्थ में बीते डेढ़ महीने से भाईचारे की इबारत लिखी जा रही है।

अभिषेक चेंडके, उज्जैन। यहां कुरान की आयतें भी पढ़ी जाती हैं और वेदों की ऋचाएं भी। आबे जम-जम की तरह शिप्रा भी पवित्र है इनके लिए। सियासत और असहिष्णुता की घुटन से अलग यहां की आबो-हवा में इंसानी जज्बातों की खुशबू घुली है। लालपुल मस्जिद में लगे इंसानियत के इस सिंहस्थ में बीते डेढ़ महीने से भाईचारे की इबारत लिखी जा रही है।

स्वामी वामदेव विरक्त मंडली के 100 से ज्यादा साधु इस मस्जिद में सिंहस्थ शुरू होने से पहले से डेरा डाले हुए हैं। मस्जिद रोशनी से नहाई हुई है। शाम को बशीर मस्तकलंदर की दरगाह के ओटले पर भगवाधारी संतों का मजमा लगा रहता है। मस्जिद का ऐसा माहौल एकता और भाईचारे में रंगे हिंदुस्तान की तस्वीर बयां करता है। मस्जिद ने दो महीने के लिए परिसर मंडली को उपलब्ध कराया है।

यहां तीन कुटियां संतों के लिए बनाई गई है और पक्के शेड में संत निवास है। सुबह और शाम को परिसर में ही पंगत बैठती है। मस्जिद के सेवादार संतों के लिए रोज पानी की व्यवस्था करते हैं और सफाई का भी ध्यान रखते हैं। रात में सुरक्षा के लिए दोनों मस्जिद में ही रुकते हैं। जो मुस्लिम मस्जिद में सजदे के लिए आते हैं, भक्त मंडली उन्हें भी प्रसादी खिलाए बगैर जाने नहीं देती।

कब्रिस्तान में संत की कुटिया

मस्जिद के पीछे स्थित कब्रिस्तान में एक संत ने कुटिया बनाई है। उन्हें अकेले रहना पसंद है। रहने के लिए कब्रिस्तान क्यों? इस सवाल पर वे कहते हैं ये शरीर मिट्टी का है। कब्रिस्तान हो या श्मशान, मेरे लिए सब एक है। यहां की मिट्टी में क्या फर्क करना।

दोनों खादिम दे रहे सेवा

मस्जिद के खादिम हबीब उल रहमान और एहमद नूर खान सिंहस्थ शुरू होने से पहले यहां सेवाएं दे रहे हैं। रहमान बताते हैं- इंसान एक-दूसरे के काम आना चाहिए। हम उनके धर्म का सम्मान करते हैं और वो हमारे। हम भी उनकी खातिरदारी में कोई कसर नहीं रखते हैं। महीने भर से यहीं सोते हैं उनके साथ ही खाते हैं। गत दिनों जब बारिश हुई तो कई संत दरगाह के पीछे बने शेड में सोए थे।

यहां रुके महामंडलेश्वर संत बलवीर कहते हैं कि हमें यहां रुकने में किसी तरह की कोई तकलीफ नहीं होती, बल्कि जो भी जरूरत थी उसे मस्जिद के खादिमों ने पूरा करने में मदद की। यहां शौचालय नहीं था तो परिसर में ही बनाने के लिए वे राजी हो गए। धार्मिक भावनाओं की यहां सच्ची कद्र हो रही है।

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