महिलाकर्मियों की नाइट शिफ्ट : बेखौफ हो रोजगार की राहUpdated: Fri, 13 Jun 2014 07:18 AM (IST)

नरेंद्र मोदी सरकार चाहती है कि महिला कर्मचारियों को रात में भी काम करने की छूट मिले। यह निश्चित ही स्वागतयोग्य कदम है।

‘20 वीं सदी के शुरू में यूरोप में महिलाकर्मियों के नाइट शिफ्ट करने पर पाबंदी की मांग उठी थी। तब लंबे सोच-विचार के बाद सरकार ने कहा था कि राष्ट्रहित को ध्यान में रखते हुए तथा आर्थिक विकास को तेजी से आगे बढ़ाने के लिए महिला कर्मचारियों को रात में भी काम करने की अनुमति जारी रहेगी।‘

नरेंद्र मोदी सरकार चाहती है कि महिला कर्मचारियों को रात में भी काम करने की छूट मिले। यह निश्चित ही स्वागतयोग्य कदम है। लेकिन महिलाओं के विरुद्ध यौन हिंसा को लेकर हाल के दिनों में भारत की खूब किरकिरी हुई है। वहशी मानसिकता के कुकर्मी बेखौफ होकर दिन के उजाले में अपनी करतूतों को अंजाम दे रहे हैं, ऐसे में यदि कोई कहे कि महिलाओं को नाइट शिफ्ट यानी रात की पाली में भी काम करने की छूट मिलना चाहिए, तो सबसे पहले सुरक्षा बंदोबस्त का सवाल उठेगा।

दो प्रमुख प्रस्ताव

महिलाएं रात पाली में काम कर सकें, इसके लिए केंद्रीय श्रम मंत्रालय ने 1948 से जारी फैक्टरी कानून में बदलाव पहल की है। इसमें दो प्रस्ताव गौरतलब हैः

  1. वर्तमान कानून के तहत कई प्रकार की फैक्टियों में महिलाओं के काम करने पर पाबंदी है, जिसे भी खत्म किया जाएगा।
  2. कर्मचारी ओवरटाइम कर सकेंगे। अभी एक तिमाही में पचास घंटे ओवर टाइम का नियम है। इस सीमा को बढ़ाकर पूरे सौ दिन कर दिया जाएगा। इससे कर्मचारियों को फायदा होगा।

सर्क्यूलर जारी, मंगवाए सुझाव

बीती पांच जून को जारी श्रम मंत्रालय के सर्क्यूलर में जानकारी दी गई है कि फैक्टरी एक्ट-1948 में बदलाव पर मंथन चल रहा है। संबंधित अधिकारियों को तीस दिन में अपने विचार भेजने को कहा गया है। फैक्टरी एक्ट में बदलाव के बाद अन्य श्रम कानूनों जैसे इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट एक्ट और कॉन्ट्रेक्ट लेबर एक्ट में भी संशोधन किया जाएगा। मालूम हो, भाजपा ने अपने चुनावी घोषणा-पत्र में कहा था कि वह सभी संबंधित पक्षों के साथ लेकर आउटडेटेड और जटिल श्रम कानूनों में बदलाव करेगी।

महिलाओं को सुरक्षाः पीछे हटती रहीं राज्य सरकारें

  • गुजरात: हाईकोर्ट ने दिया था ऐतिहासिक फैसला - दिसंबर 2013 में गुजरात हाईकोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए प्रदेश में महिलाओं के रात में भी काम करने की राह आसान की थी। कोर्ट ने फैक्टरी एक्ट की उस धारा को असंवैधानिक ठहराया था, जो फैक्टरी में महिलाओं के रात में काम करने को प्रतिबंधित करती है। सौराष्ट्र की कुछ कामकाजी महिलाओं व महिला संगठनों ने फैक्टरी एक्ट की धारा-66-1 बी को चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने फैक्टरी मालिकों एवं सरकार के लिए गाइडलाइन भी जारी की थी। इसके मुताबिक, नाइट-शिफ्ट में काम करने वाली महिलाओं को घर से फैक्टरी तक लाने, वापस ले जाने का इंतजाम किया जाए। वहीं सरकार के कहा था कि सुरक्षा और सुविधाओं की सहूलियत को ध्यान में रखते हुए फैक्ट्री मालिक को नाइट-शिफ्ट की इजाजत दी जाए।
  • महाराष्ट्र : सुरक्षा नहीं तो बार में डांस नहीं - महाराष्ट्र में डांस बार पाबंदी लगी है। सरकार का कहना है कि वह बार बालाओं को सुरक्षा मुहैया नहीं करवा सकती। प्रदेश के गृह मंत्री आरआर पाटिल ने हाल ही में कहा था कि डांस बार को डेढ़ बजे रात के बाद खोलने की अनुमति देने पर कानून-व्यवस्था बिगड़ने की आशंका रहती है। फिलहाल 60 हजार कांस्टेबलों के पद रिक्त हैं, ऐसे में सभी डांस बार को सुरक्षा नहीं दी जा सकती। मुंबई में फिलहाल 6 से 8 स्टार होटलों के पास डांस बार चलाने का लाइसेंस है, लेकिन पिछले तीन वर्षों से इसका इस्तेमाल नहीं किया गया है। बांबे पुलिस अधिनियम, 2005 में किए गए इस संशोधन का विरोध किया जा रहा है।
  • कर्नाटक : सरकार की नजर में पाबंदी ही एक मात्र रास्ता - मई 2007 में जारी अपने आदेश में कर्नाटक सरकार ने राज्य में महिलाओं की नाइट शिफ्ट यानी उनके रात में काम करने पर पाबंदी लगा रखी है। कर्नाटक विधानसभा ने बिल पारित किया है जिसमें कर्नाटक शॉप्स और एस्टाब्लिशमेंट कानून के तहत आने वाले सभी उद्यमों या कंपनियों में महिलाओं के नाइट शिफ्ट पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। हालांकि इसके तहत सूचना प्रौद्योगिकी और अस्पतालों को बाहर रखा गया है। सरकार का कहना है कि महिलाओं की सुरक्षा के लिए यही एकमात्र कदम है।

सरकार के भरोसे नहीं आईटी-बीपीओ कंपनियां

देश में जब से आईटी और बीपीओ इंडस्ट्री ने कदम रखा, नाइट शिफ्ट का चलन तब से बढ़ गया। शुरू में महिलाएं बेधड़क होकर रात में काम करती थीं, लेकिन कुछ महिलाओं को आपराधिक तत्वों ने निशाना बनाया और हालात तेजी से खराब हुए।

2005 में 24 वर्षीय प्रतिभा मूर्ति बेगलुरू स्थित अपने ऑफिस एचपी ग्लोबलसॉफ्ट कॉल सेंटर से घर लौट रही थी। तभी उसे ले जा रही कैब के ड्रायवर ने ही उसके साथ दुष्कर्म किया। जुलाई 2006 में 32 वर्षीय तान्या बनर्जी के साथ भी ऐसा ही हुआ। वे अपनी कंपनी एविवा-24/7 से लौट रही थीं, तभी कैब के ड्रायवर और साथी कर्मचारी ने दुष्कर्म के बाद हत्या कर दी।

2005 और उसके बाद हुईं दुष्कर्म की वारदातों से सबक लेते हुए आईटी कंपनियों ने अपने स्तर पर कई अहम कदम उठाए हैं, जिनसे रात में काम करने वाली महिलाओं का विश्वास बहाल होने में कुछ हद मदद मिली है।

इन कदमों से मिली राहत

अधिकांश कंपनियों ने अपने कर्मचारियों को घर तक छोड़ने की सेवाएं भी शुरू कर दी हैं। महिला कर्मचारियों वाली कैब में सुरक्षाकर्मी भी तैनात किए जाते हैं। जिस कैब में महिला कर्मचारी जाती हैं, उसमें पुरूष कर्मचारी नहीं बैठाए जाते हैं। 2006 की अपनी रिपोर्ट में महिला आयोग ने इस तरह की व्यवस्था पर संतोष जाहिर किया था।

नियम हैं पर लागू नहीं होते

  • दिल्ली गैंगरेप के बाद जारी एसोचैम की रिपोर्ट में कहा गया कि महिलाओं का आत्मविश्वास डिग गया है, खास तौर पर उन महिलाओं का, जो काम कर रही हैं।
  • दिल्ली ही नहीं, बल्कि चेन्नई, बैंगलोर, मुंबई, हैदराबाद, पुणे, अहमदाबाद, लखनऊ, जयपुर और देहरादून जैसे शहरों में भी ऐसा ही हाल है।
  • हालांकि बाद में भारतीय संसद ने नया बिल पास किया है, जिसमें काम करने की जगह पर महिलाओं के साथ छेड़छाड़ के खिलाफ कड़े कदम उठाए गए। इसके तहत सरकारी और निजी दोनों तरह के काम में लगी औरतों को सुरक्षा देने की बात कही गई है।
  • अपने खिलाफ हुए दुर्व्यव्हार के लिए पुलिस के पास पहुंचने वाली महिलाओं की संख्या बढ़ी है, लेकिन देश में दुष्कर्मों का दौर जारी है।
  • एसोसिएटिड चैंबर्स आफ कामर्स एंड इंडस्ट्री आफ इंडिया की एक सर्वे रिपोर्ट के अनुसार, देश के तमाम बड़े शहरों में नाइट शिफ्ट करने वाली करीब 73 प्रतिशत महिलाएं खुद को असुरक्षित महसूस करती हैं।
  • इनमें दिल्ली महिलाओं के लिए सबसे असुरक्षित महानगर है। इसके बाद बेंगलूर, हैदराबाद, चेन्नई और मुंबई का नंबर आता है।
  • देशभर के दस बड़े शहरों में छोटी, मझोली और बड़ी फर्मों में काम करने वाली दो हजार से ज्यादा महिलाओं से मिली जानकारी के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला गया था।
  • रात की शिफ्ट में काम करने वाली 86 प्रतिशत से ज्यादा महिलाएं उचित परिवहन व्यवस्था न होने की वजह से परेशानी होती हैं।
  • छोटी कंपनियों में काम करने वाली महिलाओं के खिलाफ मानसिक उत्पीड़न के अपराध सबसे ज्यादा 21 फीसदी दर्ज किए गए।
  • इसके बाद मझोले वर्ग की कंपनियों में 14 प्रतिशत और बड़े पैमाने की कंपनियों में आठ प्रतिशत इस तरह के मामले सामने आए हैं।

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