पुराने कानूनों को रिटायरमेंट देने की तैयारी में नरेंद्र मोदी सरकारUpdated: Mon, 08 Sep 2014 09:38 AM (IST)

कानून की किताबों में कई कानून ऐसे हैं, जो दशकों/सदियों पहले दर्ज हुए थे। आज के दौर में उनकी प्रासंगिकता सवालों के घेर में है।

कानून की किताबों में कई कानून ऐसे हैं, जो दशकों/सदियों पहले दर्ज हुए थे। आज के दौर में उनकी प्रासंगिकता सवालों के घेर में है। कई बार सरकार चलाने में भी ये बाधक बनते हैं। अब नरेंद्र मोदी सरकार ने ऐसे कानूनों में जरूरी बदलाव करने या उन्हें रद्द करने की कवायद शुरू की है।

सरकार का मकसद साफ है – कानून सहज होना चाहिए। उससे शासन प्रणाली में मदद मिलना चाहिए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इस कोशिश को आगे बढ़ाते हुए केंद्रीय सचिवालय से सभी मंत्रियों को चिट्ठी भेजी गई है, जिसमें ऐसे कानूनों की सूची बनाने को कहा गया है, जो मंत्रालय के कामकाज में बाधा बन रहे हैं।

इससे पहले इस दिशा में एक अन्य कदम उठाते हुए सरकार ने लॉ कमिशन को कहा है कि विभिन्न परियोजनाओं को हरी झंड़ी देने संबंधी नियमों में स्पष्टता लाई जाए। इससे निवेशकों के पक्ष में माहौल बनाने में मदद मिलेगी।

यह है सरकार की योजना? सरकार ने प्राकृतिक संसाधनों से जुड़ी योजनाओं के लाइसेंस और करार से जुड़े नियमों में भी बदलाव के निर्देश दिए हैं। इस संबंध में केंद्रीय कानून तथा न्याय मंत्री रविशंकर प्रसाद पहले ही कह चुके हैं कि सरकार विदेशी निवेश आकर्षित करने के लिए ‘सिंगल विंडो’ पॉलिसी पर काम कर रही है, ताकि परियोजनाओं को हरी झंडी मिलने में देरी न हो।

केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने लोकसभा में बयान दिया है कि आरटीओ बंद किए जाएंगे। इसके स्थान पर ऑनलाइन व्यवस्था पर काम किया जा रहा है। बकौल गडकरी, आरटीओ में सिवाय भ्रष्टाचार के दूसरा कोई काम नहीं होता है।

इस तरह सरकार तमाम पुराने कानून के स्थान पर नई व्यवस्था लागू करने जा रही है। इससे भ्रष्टाचार पर लगाम लगेगी और सरकारी कार्यों में पारदर्शिता आएगी।

केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री कार्यालय में सचिव आर. रामानुजम की अध्यक्षता में एक कमेटी गठित की है, ऐसे ही कानूनों की समीक्षा करेगी। कमेटी को तीन माह में रिपोर्ट पेश करने के लिए कहा गया है, जिस पर संसद के शीतकालीन सत्र में चर्चा होगी।

अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के समय भी गैर-जरूरी कानूनों की समीक्षा के लिए कमेटी गठित की गई थी। उस कमेटी ने 1382 कानूनों को रद्द करने की सिफारिश की थी। बहरहाल, अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चिंता जाहिर की है कि इनमें से महज 415 को ही रद्द किया गया है। वर्तमान कमेटी शेष कानूनों की भी समीक्षा करेगी।

अजब-गजब कानून : आसमान से फेंके पर्चे जमीन पर नहीं गिरने चाहिए

  • देश में लागू अजब-गजब कानूनों में इंडियन मोटर व्हीकल एक्ट 1914 भी एक है। इसके तहत दक्षिण आंध्रप्रदेश में ड्यूटी पर आने वाले इंस्पेक्टर के दांत साफ होने चाहिए। उसकी छाती पर बाल नहीं होने चाहिए। उसके पंजे सीधे नहीं होना चाहिए।
  • इसी तरह गंगा में चलने वाली यात्री नावों का टोल टैक्स दो आना से ज्यादा नहीं होना चाहिए। 200 साल पुराना वह कानून आज भी लागू है, जिसमें कहा गया है कि ब्रिटेन के राजा को भारत की सभी अदालतों के फैसलों की समीक्षा करने का अधिकार है।
  • इसी तरह शहरी विकास मंत्रालय ने 1949 से लागू ऐसे कानून की जानकारी निकाली है, जिसमें दिल्ली की होटलों में 20 फीसद कमरे सरकार मेहमानों के लिए बुक होंगे। सरकार जब चाहे होटल खाली करवा सकती है।
  • राज्यों के बीच विभाजन की स्थिति पर भी कई हास्यास्पद कानून अस्तित्व में हैं। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान बना वह कानून आज भी लागू है, जिसमें कहा गया कि यदि भ्रामक प्रचार के उद्देश्य से किसी विमान से पर्चे फेंके गए हैं, तो यह पुलिसवालों की जिम्मेदारी है कि वे पर्चे जमीन पर न गिरने दें।
  • पुलिस में अच्छा काम करने वालों की सिफारिश सेना में शामिल करने के लिए की जाएगी। यह व्यवस्था आज पूरी तरह से अप्रासंगिक है।
  • 2005 में बने अल्पसंख्यक मंत्रालय के वक्फ (संशोधित) एक्ट में भी 1913 में बने मुलसमान वक्फ वेलिडेटिंग एक्ट लागू रखा गया है। इस मंत्रालय ने भी 300 से ज्यादा कानूनों को निष्क्रिय करने की वकालत की है।
  • वेग्रन्सी एक्ट में प्रावधान है कि यदि कोई फटे-पुराने कपड़ों में चहलकदमी कर रहा है तो उसके खिलाफ केस किया जा सकता है।
  • 1838 में बने कोस्टिंग वेसल्स एक्ट के तहत यह अनिवार्य है कि जहाज पर उस स्थान की ब्रांडिंग करना जरूरी है, जहां वह चलाया जा रहा है।
  • 1894 में बने लेपर्स एक्ट में प्रावधान है कि गरीब कुष्ठरोगियों को निःशुल्क इलाज कराया जाए।

ऐसा ही एक बदलाव खुशियां बांटने की तैयारी में

पुराने कानूनों में जरूरी बदलाव की कवायद के बीच केंद्र सरकार बच्चा गोद लेने की प्रक्रिया में भी ढील देने जा रही है। सबकुछ ठीक रहा तो 55 वर्ष वाले भी बच्चा गोद ले सकेंगे।

टेलीग्राफ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार ने प्रोस्पेक्टिव एडोप्टिव पैरेंट्स (पीएपी) के लिए उम्र में ढील देने का फैसला किया है। नए नियमों के मुताबिक, न्यूनतम 25 वर्ष से लेकर अधिकतम 55 वर्ष के लोग बच्चा गोद ले सकते हैं। गोद लेने वाला कोई जोड़ा हो सकता है या कोई अकेला शख्स। गोद लिए जाने वाले बच्चे की उम्र पर भी कोई बंदिश नहीं है।

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