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खफा लता मंगेशकर ने कहा- मैं अब रफी साहब के साथ कभी नहीं गाऊंगीUpdated: Wed, 07 Sep 2016 10:51 AM (IST)

एक अन्य महान गायक मोहम्मद रफी साहब से तो इतना विवाद हुआ कि लताजी ने उनके साथ गाने से इंकार कर दिया।

अपनी आवाज से करोड़ों लोगों के लिए सुख, उदासी, उल्लास, खुशी, गम, आंसू और प्रेम के अहसास जगाने वाली स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर का जीवन परिकथा से कम नहीं। उन्होंने मुफलिसी के जीवन से देश का सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न पाने तक का सफर तय किया।

मगर इस सफर में कुछ ऐसे पड़ाव भी रहे, जहां लताजी ने अपनी मृदु, निर्मल और शांत छवि के विपरीत नाराज और हक के लिए लड़ लेने वाली महिला का किरदार निभाया। दरअसल, उन्होंने फिल्मों में पार्श्वगायन करने वाले गायकों को रॉयल्टी दिए जाने की लड़ाई के लिए इंडस्ट्री के कुछ दिग्गजों से रार तक ठान ली थी।

एक अन्य महान गायक मोहम्मद रफी साहब से तो इतना विवाद हुआ कि लताजी ने उनके साथ गाने से इंकार कर दिया। कहा जाता है कि रॉयल्टी के विवाद के बाद उन्होंने मोहम्मद रफी के साथ फिर से गाना तभी स्वीकार किया जब रफी साहब ने माफीनामा लिखकर लताजी को दिया।

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रॉयल्टी का यह विवाद 1962-63 में तब शुरु हुआ जब लताजी ने गीतों की रॉयल्टी में पार्श्वगायकों को भी हिस्सा देने की मांग की। तब फिल्म निर्माता कुछ बड़े संगीतकारों को उनकी फीस के अलावा संगीत की रॉयल्टी का पांच प्रतिशत हिस्सा दिया करते थे। लताजी की मांग थी कि इस पांच प्रतिशत में से आधा हिस्सा पार्श्वगायक को मिलना चाहिए।

उस समय पुरुष पार्श्वगायकों में रफी साहब अग्रणी थे इसलिए लताजी ने उनसे समर्थन मांगा। मगर रफी साहब का कहना था कि गीत गाने के लिए फीस मिलना ही काफी है, इसलिए वे रॉयल्टी में हिस्सा नहीं चाहते। रफी साहब से समर्थन नहीं मिलना लताजी को अच्छा नहीं लगा।

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इसी बीच फिल्म 'माया" के गीत 'तस्वीर तेरी दिल में जिस दिन से उतारी है" की रिकॉर्डिंग के दौरान लताजी और रफी साहब के बीच गीत के बोल को लेकर बहस हो गई। रॉयल्टी मुद्दे के कारण पहले से खफा लताजी ने रफी साहब के साथ गाने से मना कर दिया। रफी साहब ने भी कह दिया- लता के साथ गाने की मेरी भी इच्छा उतनी ही है जितनी लता की मेरे साथ गाने की है। नतीजतन, दोनों महान कलाकारों ने कई वर्ष तक कोई गीत साथ नहीं गाया। आखिरकार 1967 में सुलह हुई और दोनों ने मिलकर फिल्म 'ज्वेल थीफ" का गीत 'दिल पुकारे....आ रे, आ रे" गाया।

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