दर्द से तड़पती रही एक मां तो दूसरी रोती रही, सोते रहे डॉक्टरUpdated: Tue, 12 Sep 2017 08:55 PM (IST)

भगवान को सोमवार-मंगलवार की दरमियानी रात ऐसी नींद आई कि दो मरीजों की सांसों की डोर टूटने तक यह नींद नहीं टूटी।

मुरैना। डॉक्टर को धरती का भगवान कहते हैं। लेकिन इस भगवान को सोमवार-मंगलवार की दरमियानी रात ऐसी नींद आई कि दो मरीजों की सांसों की डोर टूटने तक यह नींद नहीं टूटी। दोनों घटनाएं जिला अस्पताल की हैं। एक घटना में बच्चे को जन्म देने वाली प्रसूता जानलेवा दर्द के कारण चल बसी, क्योंकि मेटरनिटी में जिन महिला डॉक्टर की ड्यूटी थी वे अपने घर पर चैन से सो रहीं थीं।

वहीं एक बच्चे की भी जान इसी रात चली गई क्योंकि उसे ग्वालियर ले जाने की उसकी मां जिस एंबुलेंस को लेने गई थी उसका किराया चुकाने उसके पास 850 रुपए नहीं थे और नि:शुल्क 108 एंबुलेंस को बुलाने जिन डॉक्टर साहब को फोन करना था वे एसी कमरे में सो रहे थे। इस घटना के बाद अस्पताल प्रबंधन हमेशा की तरह मरीजों की सीरियस हालत होने की बात कहता रहा। जिस दौरान अस्पताल में हंगामा हो रहा था। उस दौरान स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी ग्वालियर की एक मीटिंग में जाने के लिए खुद को तैयार कर रहे थे। यही वजह रही कि दोपहर तक अधिकारी अस्पताल भी नहीं पहुंचे।

घटना 1

मुरैना नंदे का पुरा गांव में रहने वाली मधु पत्नी जंडेल सिंह परमार का 14 साल का बेटा घंसु को रात को तेज बुखार आया और उल्टियां भी हुईं। मधु का पति मधु के साथ नहीं रहता। अकेले मधु किसी तरह बेटे को लेकर रात 4 बजकर 30 मिनट पर अस्पताल पहुंचीं यहां पर इमरजेंसी डॉक्टर संजीव बांदिल ने बच्चे को प्राथमिक उपचार दिया और पीड्रियाट्रिक्स इंसेंटिव केयर यूनिट में भर्ती कर दिया, लेकिन बच्चे की हालत नहीं सुधरी। हालत बिगड़ते देख बच्चे को 5 बजकर 10 मिनट पर ग्वालियर रेफर कर दिया गया। मधु से कहा गया कि वह एंबुलेंस का इंतजाम कर ले, क्योंकि बच्चे की हालत खराब है। मधु ने बताया कि वह दौड़ती हुई रेड क्रॉस की एंबुलेंस लेने पहुंची। यहां उसे बताया गया कि इस एंबुलेंस को ले जाने के लिए 850 रुपए की रसीद कटानी होगी। मधु ने कर्मचारी को रोते हुए कहा कि उसके पास अगर 850 रुपए होते तो वह बेटे का इलाज प्राइवेट तौर से ही करवा लेती। अपने पास मौजूद 10 और 20 के एक दो नोट दिखाकर मधु ने कर्मचारी से कहा कि उसके सिर्फ यही पैसे हैं। इसके बाद अस्पताल चौकी पर तैनात पुलिस कर्मी ने मधु को बताया कि उसके बेटों को 108 एंबुलेंस फ्री में ग्वालियर ले जा सकती है, लेकिन इसके लिए डॉक्टर को खुद कॉल करनी होगी। वह दौड़ती हुई इमरजेंसी वार्ड के एसी कमरे में सो रहे डॉक्टर को जगाने पहुंची। मधु ने बताया कि उसने बाहर से डॉक्टर को आवाज दी, लेकिन डॉक्टर ने कोई जवाब नहीं दिया। इसके बाद कंपाउंडर ने महिला की हालत पर तरस खाकर 108 एंबुलेंस को फोन किया। इस दौरान सुबह के करीब सवा छह बज चुके थे। 108 एंबुलेंस आती उससे पहले ही मधु को बताया गया कि उसके बेटे ने दम तोड़ दिया है।

ढाई घंटे बच्चे के शव की तरफ पीठ कर रोती रही मां

बच्चे की मौत के बाद भी मां की तकलीफ खत्म नहीं हुई। वह बच्चे की लाश को घर ले जाना चाहती थी। लेकिन फिर से वही सवाल था कि एंबुलेंस चाहिए। इसी दौरान कुछ नेता अस्पताल आए और महिला को इंसाफ दिलाने की बात कहकर उसे अस्पताल में ही रुकने को कहा। अपने मर चुके बच्चे का चेहरा देख पाना इस मां के लिए मुश्किल हो रहा था। ढाई घंटे मां पलंग के नीचे बच्चे की ओर पीठ करके रोती रही। इसके बाद पुलिस आई और एंबुलेंस से बच्चे के शव को मां सहित घर भिजवाया।

सवाल

-पीकू में जिन डॉक्टर की ड्यूटी थी, उन्होंने समय रहते बच्चे को रेफर क्यों नहीं किया।

-पीकू में तैनात डॉक्टर ने एंबुलेंस के लिए 108 पर कॉल क्यों नहीं किया।

-पीकू में तैनात डॉक्टर ने चाइल्ड स्पेश्‍लिस्ट को कॉल पर क्यों नहीं बुलाया।

-अगर पीकू में डॉक्टर तैनात थे तो बेबस मां को बार-बार इमरजेंसी ड्यूटी डॉक्टर के पास क्यों भेजा जा रहा था।

घटना-2

नंदे का पुरा रहने वाली नीतू पत्नी जबर सिंह कुशवाह रविवार को डिलेवरी के लिए अस्पताल लाई गई थी। सोमवार दोपहर 2 बजे के करीब नीतू की डिलेवरी हुई। नीतू ने बेटे को जन्म दिया था। सब कुछ ठीक था। कुछ परेशानियां थीं। जिन्हें डॉक्टर नार्मल बता रहे थे। रात करीब 2 बजे नीतू ने असहनीय दर्द की शिकायत की। नर्स ने नीतू को डॉक्टर की लिखी दवा दी। नर्स ने मीडिया को बताया कि हालत खराब होते देख वह दौड़कर नीचे गई और इमरजेंसी डॉक्टर संजीव बांदिल से दवा पूछकर आई और महिला को इंजेक्शन दिया। इधर परिवार वालों ने बताया कि प्रसूता विंग में कोई महिला डॉक्टर मौजूद नहीं थी। बताया गया कि इस रात डॉ. शलिनी मिश्रा की ड्यूटी यहां लगाई गई थी, लेकिन शालिनी मिश्रा यहां नहीं थीं। वे अपने घर पर आराम कर रहीं थी। मीडिया को नर्स ने बताया कि उसने डॉ. मिश्रा को फोन भी किए, लेकिन फोन रिसीव नहीं हुए। इसके बाद नर्स ने इमरजेंसी डॉक्टर संजीव बांदिल को जगाया। डॉ. बांदिल जब तक यहां पहुंचे महिला ने दम तोड़ दिया।

महिला के भाई अर्जुन ने बताया कि रात को कोई महिला डॉक्टर उसकी बहन के जिंदा रहते ऊपर नहीं आईं। जब महिला की मौत हो गई तो डॉ. शालिनी मिश्रा यहां आईं और लिखा पढ़ी में जुट गईं। अर्जुन ने आरोप लगाया कि अगर महिला ड्यूटी डॉक्टर यहां होती तो नीतू की जान बच जाती। नीतू की मौत के साथ ही नीतू के नवजात बच्चे के सिर से मां का साया उठ गया।

परिजनों ने लगाया जाम

परिजनों ने प्रबंधन पर लापरवाही का आरोप लगाते हुए कलेक्टर बंगले पर जाम लगाया। परिजनों का आरोप था कि रात को डॉक्टर्स मौजूद होते तो नीतू नहीं मरती। परिजनों को प्रशासन ने कार्रवाई का अश्वासन दिया। इसके बाद परिजनेां ने जाम खोल दिया और नीतू के शव को ले गए।

सवाल

-डॉ. शालिनी मिश्रा अगर ड्यूटी पर थीं तो इमरजेंसी डॉक्टर संजीव बांदिल को मेटरनिटी में क्यों आना पड़ा।

-अगर डॉ. मिश्रा कॉल ड्यूटी पर थीं तो सिस्टर के फोन करने पर तत्काल क्यों नहीं आईं।

-मेटरनिटी विंग में रात के समय महिला डॉक्टर की मौजूदगी क्यों सुनिश्चित नहीं हुई।

डॉक्टर्स की सुनें

-इस मामले में डॉ. शालिनी मिश्रा से बात करने के लिए उनके मोबाइल पर कई कॉल किए गए, लेकिन कोई कॉल रिसीव नहीं हुआ।

किसी की बात नहीं हुई

मेरे से एंबुलेंस को लेकर किसी की बात नहीं हुई। पीकू में तैनात डॉक्टर कहां थे। उन्हें एंबुलेंस बुलानी चाहिए थी। मैं इमरजेंसी रूम में था। मैं अगर सो रहा होता तो रात को जो 250 मरीज भर्ती हुए उन्हें किसने भर्ती किया। मेटरनिटी में डॉक्टर न होने से मैं वहां भी महिला को देखने गया था। जहां तक बच्चे की मौत का सवाल है तो मुझे जितना इलाज आता था, मैंने लिख दिया। अब सिस्टर की ड्यूटी थी कि वह कॉल करके स्पेशलिस्ट डॉक्टर को बुलाती।

डॉ. संजीव बांदिल

इनका कहना है

हम लोग बैठक में ग्वालियर थे। अभी लौट रहे हैं। इन घटनाओं की जांच के लिए टीम बनाई गई हैं। जो जांच करेगी। बिना जांच के कुछ नहीं कहा जा सकता। डॉक्टर ड्यूटी पर थे या नहीं, इस बात की जांच होने के बाद अगर कोई दोषी पाया जाएगा तो हम कार्रवाई करेंगे।

डॉ. अनिल कुमार सक्सेना, सिविल सर्जन

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