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एक दशक पहले लिखा 'ए झामरू... ए झामरू...' अब चर्चाओं मेंUpdated: Tue, 18 Apr 2017 11:22 PM (IST)

लिखने और गाने वाले थियेटर कलाकार मूलत: महेश्वर के प्रवीण चौबे फिलहाल भोपाल के भारत भवन से संबद्ध हैं।

अमित भटोरे, खरगोन। लगभग एक दशक लिखा गया एक निमाड़ी-आदिवासी गीत आजकल लोगों की जुबां पर जिस तरह चढ़ा है, उसे देखकर गीतकार खुद अचंभे में है। यह गीत 'ए झामरू...ए झामरू...' को लिखने और गाने वाले थियेटर कलाकार मूलत: महेश्वर के प्रवीण चौबे फिलहाल भोपाल के भारत भवन से संबद्ध हैं।

उल्लेखनीय है कि इन दिनों देशभर में यह गीत शादी और अन्य आयोजनों में प्रमुखता से बजाया जा रहा है। गीत के बोल पूरी तरह आदिवासी मांगलिक उत्सव के दृश्य को उकेरते हैं। चौबे को संस्कृति मंत्रालय दिल्ली से जूनियर फेलोशिप भी मिल चुकी है।

शहीद भीमा नायक नाटक में किया था मंचन

रंगकर्मी चौबे ने नईदुनिया से खास बातचीत में बताया कि उन्होंने बड़वानी जिले के क्रांतिकारी शहीद भीमा नायक व खाज्या नायक के जीवन पर नाटिका तैयार की। वर्ष 2006 में इस नाटिका का उन्होंने भोपाल के भारत भवन में मंचन किया था। इसी नाटिका में 'ए झामरू ..." गीत था।

इसके बाद उन्होंने इस नाटिका का कई रंगमंचों पर मंचन किया। पिछले कुछ समय से यह गीत प्रसिद्ध हुआ। इस गीत के बोल हैं- 'ए झामरू... ए झामरू... झामरू गुड्डू ताड़ी पी न नाचो रेऽ, भीमा को हुई रयो याव तम तो नाचो रेऽ।" चौबे ने बताया कि इसी एलबम के चार अन्य गीत भी जल्द रिलीज किए जाएंगे।

100 से अधिक नाटकों का मंचन

चौबे बताते हैं कि वे पिछले 20 वर्षों से रंगकर्म से जुड़े हैं। उनका मकसद लोक कला को जीवित रखते हुए क्षेत्रीय निमाड़ी और आदिवासी परंपरा, लोक कला और संस्कृति को जन-जन तक पहुंचाना है। वे देशभर के विभिन्न् शहरों में अपनी प्रस्तुति दे चुके हैं।

उन्होंने भीमा नायक, खाज्या नाईक, डाकघर, भगोरिया, सच का बोलबाला, देवी अहिल्या, किस्से आफंती के, रणवीर सहित 100 से अधिक नाटिकाओं में अभिनय किया है। साथ ही 40 से अधिक नाटकों को निर्देशित किया है। उनके पिता सत्यनारायण चौबे महेश्वर मेें ही समाजसेवी हैं और मां रुक्मणि गृहिणी हैं।

प्रोत्साहन मिले

इन दिनों चर्चित लोकगीत को लिखने व गाने वाले इसी जिले के हैं, यह गर्व की बात है। लोक संस्कृति के साथ अब फिल्म उद्योग में भी महेश्वर के रूप में इस जिले की नई उपस्थिति दर्ज हुई है। कलाकारों को प्रोत्साहन मिलते रहना चाहिए। -शिशिर उपाध्याय, साहित्यकार व गीतकार, बड़वाह

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