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वीडियो : उम्र महज 3 साल, समझतीं हैं हस्तक और तत्कारUpdated: Mon, 15 May 2017 03:50 AM (IST)

छोटे-छोटे हाथों से बनती हस्तक (हाथ) मुद्राएं। कभी सही तो कभी गलत भी।

जबलपुर। छोटे-छोटे हाथों से बनती हस्तक (हाथ) मुद्राएं। कभी सही तो कभी गलत भी। नन्हें से पैरों पर बंधे घुंघरू और उन्हें संभालती ये नन्हीं-नन्हीं नृत्यांगनाएं। कभी गुरु जो सिखा रहीं उसे वैसे ही दोहराना तो कभी मन न होने पर पैर भी न हिलाना। पल में हंसना तो कुछ ही पल में मचलकर रोने भी लगना।

2 से 4 साल की उम्र में जहां बच्चा हर पल अपनी मां के साथ रहता है वहां ये बाल नृत्यांगनाएं शास्त्रीय नृत्य कथक के तत्कार (पैर की ताल), पठंत और हस्तक की मुद्राएं सीखने में लगी हैं। कथक गुरु स्वाति मोदी तिवारी बताती हैं कि इतने छोटे बच्चों को सिखाना आसान तो नहीं लेकिन जरूरी बहुत है।

एक नियम में ढालना आवश्यक

ऐसा बोला जाता है कि जितनी कम उम्र से बच्चों में संस्कार डाले जाएं उतना ही अच्छा। क्योंकि छोटे बच्चों का मन-मस्तिष्क खाली होता है। उन्हें हम जो-जैसा भी सिखाएंगे वो वैसा ही सीखेंगे। शास्त्रीय विधा फिर चाहे व नृत्य हो या संगीत। नियम और अनुशासन बहुत जरूरी है। इसलिए जरूरी है कि इतनी छोटी उम्र में इन बच्चियों को नियमित समय पर डांस क्लास आने का अनुशासन आए। भले ही अभी हाथ-पैर बस हिला ही रहीं हों लेकिन ये आदत पड़ना भी आवश्यक है।

कम उम्र में सीखने के फायदे

- अनुशासित माहौल में रहने की आदत

- नियम सीखना

- किसी विधा को सीखने में कितनी मेहनत लगती है इसका अहसास और समझ

- कला व अन्य विधाओं के प्रति लगाव

- बड़ों का आदर

- साथ मिलकर काम करने की आदत

- आपसी सामंजस्य

- समय की पाबंदी

- नैतिक मूल्य

- संवेदना

- अज्ञाकारी होना

- एकाग्रता बढ़ना

- नियमित डांस के रूप में एक्सरसाइज होना

- बॉडी पॉइश्चर ठीक रहना

- अपनी कला-संस्कृति की जानकारी होना

पेरेन्ट्स की बढ़ रही रुचि

कुछ साल पहले तक पेरेन्ट्स बच्चों को सिर्फ पढ़ाई तक ही केंद्रित रखना चाहते थे। लेकिन इधर पिछले 6 से 8 साल में पेरेन्ट्स की सोच में काफी बदलाव आया है। अपनी बेटी को कथक सिखा रहीं नेहा गोस्वामी ने बताया कि पढ़ाई के साथ अन्य विधाएं सीखना भी जरूरी है। हम चाहते हैं कि हमारी बेटी जो सीखना चाहती है वह सीखे। जब से बेटी गरिमा डांस सीखने आ रही है उनके पूरे व्यवहार में सकारात्मक परिवर्तन आया है। पिछले 2 सालों से कथक सीख रही है। इसका असर उसकी पढ़ाई और एकाग्रता में भी दिखता है। इसी तरह अनुकृति पेठिया ने बताया कि उनकी 3 साल की बेटी जान्हवी को तो बस डांस क्लास जाने की धुन रहती है। पहले जान्हवी थोड़ी जिद्दी थी लेकिन अब हर बात मानने लगी है।

बच्चों की रुचि समझने की कोशिश

छोटे बच्चों के साथ समय बहुत देना होता है। साथ ही पेशेंस भी रखना जरूरी है। हम लोग पहले बच्चों के साथ बात-चीत से शुरुआत करते हैं। धीरे-धीरे बच्चे खुद ही नृत्य करना शुरू कर देते हैं। हम बच्चों के साथ पेरेन्ट्स की भी काउंसिलिंग करते हैं कि बच्चे की जिस भी विधा में रुचि हो उसे वही सिखाएं।

स्वाति मोदी तिवारी, वरिष्ठ कथक नृत्यांगना और नृत्य गुरु

अच्छा लगता है नृत्य

मैं एलकेजी में पढ़ती हूं और कथक करना अच्छा लगता है। यहां सभी दीदी लोग डांस करती हैं तो मैं भी उनके साथ रोज प्रेक्टिस करती हूं।

विनी जैन, बाल नृत्य साधक

बनना है नृत्यांगना

मुझे पैर में घुंघरू बांध कर डांस करना अच्छा लगता है। बड़े होकर डांसर बनना है। इसलिए अभी से सीख रही हूं। रोज आती हूं डांस क्लास।

अंबिका श्रीवास, बाल नृत्य साधक

रहता है इंतजार

जब स्कूल जाते हैं तब भी और अभी छुट्टियों में भी इंतजार रहता है कि कब शाम होगी और डांस क्लास जाएंगे। मैं अभी सैकंड क्लास में पढ़ती हूं। गरिमा गोस्वामी, बाल नृत्य साधक

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