एसजीएसआईटीएस को 'सेंटर ऑफ एक्सीलेंस' बनाएगा नैनो सैटेलाइटUpdated: Fri, 15 Sep 2017 11:59 AM (IST)

'इसरो' की मदद से एसजीएसआईटीएस अंतरिक्ष में सैटेलाइट भेजने की तैयारियों में जुटा है।

अनिल त्रिवेदी, इंदौर। 'इसरो' की मदद से एसजीएसआईटीएस अंतरिक्ष में सैटेलाइट भेजने की तैयारियों में जुटा है। इस सिलसिले में इसरो की टीम इसी साल कॉलेज विजिट कर चुकी है। उसने सैटेलाइट बनाने के लिए संस्थान में किन-किन संसाधनों की जरूरत होगी, इसकी विस्तृत जानकारी भी मुहैया करा दी है। सैटेलाइट के लिए बेस स्टेशन की जगह का भी निर्धारण हो चुका है। प्रोजेक्ट के लिए वर्ल्ड बैंक द्वारा मुहैया कराई गई 15 करोड़ रु. की फंडिग का इस्तेमाल किया जा रहा है।

इसरो की सहायता से एसजीएसआईटीएस द्वारा अपना सैटेलाइट अंतरिक्ष में भेजे जाने के बाद संस्थान को 'सेंटर ऑफ एक्सीलेंस' का दर्जा मिल जाएगा। इससे संस्थान के 'ड्रीम्ड यूनिवर्सिटी" बनने का रास्ता साफ हो जाएगा।

पुणे का कॉलेज कर रहा मेंटरिंग

संस्थान के निदेशक डॉ. राकेश सक्सेना ने बताया कि एसजीएसआईटीएस सैटेलाइट बनाने का आधिकारिक प्रस्ताव भेज चुका है और सैद्धांतिक स्तर पर तमाम तैयारियां पूरी हो चुकी हैं। इसमें एसजीएसआईटीएस की मेंटरिंग 'कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग, पुणे' कर रहा है, जिसके सैटेलाइट को इसरो पहले ही अंतरिक्ष में भेज चुका है। पुणे के इस संस्थान के अलावा अब तक आईआईटी कानपुर, आईआईटी मुबंई, पीईएस बेंगलुरू और अन्ना यूनिवर्सिटी चेन्नई के सैटेलाइट भी अंतरिक्ष में भेजे जा चुके हैं। इसरो के सैटेलाइट सेंटर प्रोजेक्ट हेड डॉ. आलोक श्रीवास्तव के मुताबिक मध्यप्रदेश के किसी तकनीकी संस्थान को पहली बार इस तरह की जिम्मेदारी सौंपी गई है। इसमें संस्थान के 60 प्रोफेसर और स्टूडेंट्स इसमें भागीदारी कर रहे हैं।

मील का पत्थर साबित होगा प्रोजेक्ट

प्रोजेक्ट से जुड़े असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. एसके जैन के मुताबिक सैटेलाइट की मदद से नर्मदा किनारे जल संरक्षण के लिए लगाए जाने वाले पेड़ों के अभियान को मदद मिलेगी। इसके अलावा शहर में ट्रैफिक कंट्रोल के लिए भी इसका उपयोग किया जा सकेगा। पर्यावरण प्रदूषण और ह्यूमेडिटी चेक करने में इससे मदद मिलेगी। निगम अधिकारियों की सहमति के बाद इसे स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट में भी इस सैटेलाइट की मदद ली जा सकेगी। 'डिजिटल इंडिया' कॉन्सेप्ट के चुनिंदा बिंदुओं में भी इसका इस्तेमाल किया जाएगा। मगर इसका सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि मौसम संबंधी जानकारियां ज्यादा सटीक मिल सकेंगी।

यह होगा फायदा

- एसजीएसआईटीएस को 'ड्रीम्ड यूनिवर्सिटी" बनाने में यह कदम मील का पत्थर साबित होगा।

- संस्थान का सैटेलाइट लांच होने के बाद इसे यूजीसी और एआईसीटीई (ऑल इंडिया कौंसिल फॉर टेक्निकल एजुकेशन) से सीधी फंडिग मिलने लगेगी।

- स्टूडेंट्स को बेहतर एक्सपोजर मिलेगा। संस्थान द्वारा उन्हें बेहतर संसाधन और सुविधाएं मुहैया कराई जा सकेंगी।

- ये सैटेलाइट लांच होने से मौसम और पर्यावरण संबंधी जानकारियां ज्यादा सटीक मिलेंगी।

- इन मामलों से जुड़े शोधों की गुणवत्ता भी बेहतर होगी।

- हर साल ओला-पाला और अत्यधिक बारिश व सूखे के चपेट में आने की वजह से चौपट होने वाली अरबों-खरबों रुपयों की फसलें बचाई जा सकेंगी।

एक नजर, सैटेलाइट पर

- एसजीएसआईटीएस द्वारा भेजे जाने वाले नैनो सैटेलाइट का वजन करीब 10 किलो होगा।

- इसका आकार एक मीटर क्यूब जैसा होगा।

- इसका पेलोड नर्मदा किनारे बनाया जाएगा। (ये सेटेलाइट का मेजर कंपोनेंट होता है, जो अप्लीकेशन को टारगेट करता है। नर्मदा के किनारे 2.5 किमी का एरिया इसके लिए चयनित किया गया है। पूरे सेटेलाइट की डिजाइनिंग इस अप्लीकेशन को टारगेट रखकर किया जाता है।)

- सैटेलाइट का एंटीना वीएचएफ (वेरी हाई फ्रिक्वेंसी) का होगा जबकि ट्रांसमीटर और रिसीवर 2 गीगा हर्ट्ज के होंगे।

- ये नैनो सैटेलाइट 2019 में अंतरिक्ष में भेजा जाएगा।

- इसके लिए करीब 60 प्रोफेसर्स और स्टूडेंट्स की टीम लगी है।

'स्वच्छता रैंकिंग में 5 में 2 स्थान इंदौर को'

हायर एजुकेशनल इंस्टीट्यूशंस की 'स्वच्छता रैंकिंग 2017' में शीर्ष 5 में शहर के दो संस्थानों को जगह मिली है। इसमें देश भर के 80 जिले और संस्थान शामिल हुए थे। एसजीएसआईटीएस को झाबुआ जिले के कालियाबड़ा गांव को खुले से शौचमुक्त करने, सौ फीसद सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट और लिक्विड वेस्ट मैनेजमेंट का लक्ष्य पाने के लिए ये पुरस्कार प्रदान किया गया है। गुरुवार को दिल्ली की चाणक्यपुरी में स्थित अशोका हॉल में केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने यह पुरस्कार एसजीएसआईटीएस के प्रो. मिलिंद दांडेकर और झाबुआ कलेक्टर आशीष सक्सेना को प्रदान किया।

शहर के ही आईआईटी को ये पुरस्कार सिमरोल स्थित गांव में स्वच्छता कार्यों के लिए दिया गया। इसके अलावा मेड़क, वारंगल और अजमेर जिलों को भी इस स्वच्छता रैंकिंग में जगह मिली है। प्रो. दांडेकर ने बताया कि उन्नत भारत अभियान के तहत ग्रामीण विकास में तकनीकी शिक्षण संस्थाओं की भूमिका और उपयोगिता के तहत इन पुरस्कारों की स्थापना की गई है।

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