सिमट कर न रह जाए ये अमूल्य उपहार 'गौरैया'Updated: Fri, 08 Apr 2016 09:23 AM (IST)

नन्ही गौरैया को संरक्षित करने लिए नईदुनिया ने जो पहल की है, उसमें अब बच्चों से लेकर बड़े तक जुड़ते जा रहे हैं।

इंदौर। शहरों में घरों के आंगन से गुम होती नन्ही गौरैया को संरक्षित करने लिए नईदुनिया ने जो पहल की है, उसमें अब बच्चों से लेकर बड़े तक जुड़ते जा रहे हैं। घर की छत पर कोई इनके लिए दाना-पानी रख रहा है तो कोई अपनी रचनाओं के द्वारा जागरूकता की अलख जगा रहा है। ऐसी ही कुछ रचनाओं को हम आप तक पहुंचा रहे हैं।

कविता

'गौरैया रानी'

बचपन की यादों के अवशेष में

गौरैया रानी तुम आज भी शेष हो

नभ का श्रृंगार कहूं या कहूं

तुम्हे धरती का प्यार

हम इंसानों को भी है तुम्हारी ही दरकार

तुम्हारी चहचहाट के चश्मदीदी है ये कर्ण

जिसे सुन जोश और होश से

भर जाता मन

फुदक-फुदककर दानें चुन

करती श्रम का आव्हान

धैर्य और साहस से तिनका-तिनका बुन

किया खूबसूरत घोंसलों का निर्माण

नहीं किसी से बैर

देती सबको सम्मान

शक्ति इतनी कि मुट्ठी भर पंख पसार

छू लेती आसमान

ऐसी प्यारी प्रेरक गौरैया

जबसे तुम खो गई

लगता है यूं जैसे

सारी जमीं सो गई

भोर भये सांझ ढले रोज

आती हो

बाल मन की अतुल गहराइयों की

अविस्मरणीय साथी हो

तुम्हारा सत्कार करने को आतुर

प्रकृति ने भी ओढ़ ली चुनरिया धानी

चौबारें चौबारे सजे अन्ना के दाने

मुंडेर-मुंडेर पसरा शीतल पानी

अब और न तरसाओ

शीघ्र लौट आओ गौरैया रानी

मीरा जैन

516 साईनाथ कॉलोनी (सेठी नगर), उज्जैन

संस्मरण

'और जब फुर्र से उड़ गई गौरैया...'

बात उस समय की है जब मेरी मम्मी (मीना कुरील) की तबियत खराब थी। उन्हें ठंड लगकर बुखार आ रहा था। हम सब भाई-बहन छत पर धूप में बैठे खाना खा रहे थे। तभी अचानक एक गौरैया का छोटा सा बच्चा मेरी मम्मी की थाली में जा बैठा। वह उड़ नहीं पा रहा था। तब मम्मी ने पापा (स्व. राजकुमार कुरील) को बुलाया। पापा ने एक कपड़े से उस बच्चे को पकड़ा। पापा ने उस नन्हे से बच्चे को पिंजरे में रख दिया। हमें पापा ने पिंजरे के पास जाने के लिए भी मना कर रखा था। हम सभी चुपचाप छुप-छुपकर कई दिनों तक पापा की गौरैया के बच्चे के प्रति प्रतिक्रियाएं देखते रहे।

कुछ दिन बाद कमरे में वह अच्छे से उड़ भी सकता था। पापा ने हम सब को छत पर एक दिन बुलाया और उस बच्चे को हाथों में लेकर आसमान की ओर जोर से उछाल दिया। हम घबरा गए थे, लेकिन तब तक वो गौरैया वहां से उड़ गई थी। पापा ने कहा कि अब वह अपने परिवार के पास जाकर शायद खुश होगी। उन्हें भी शायद उसके जाने का दुख था।

पापा और गौरैया की प्रगाढ़ हो गई मित्रता

थोड़ी ही देर बाद वही गौरैया दूसरी गौरैयाओं और पंछियों के साथ वहां आई। पापा ने बाजरा और चावल छत पर फैला दिए। गौरैया ने दाना चुगा और वहां से चली गईं। कुछ वर्षों तक यह सिलसिला चलता रहा। पापा और गौरैया की यह मित्रता गाढ़ी होती गई। विगत वर्ष पापा का देहावसान हो गया। उस दिन भी गौरैयाओं का समूह वहां आया, पर वह एकदम शांत थी मानों उन्हें श्रृद्धांजलि अर्पित कर रही हों।

पक्षी भी होते हैं प्यार के भूखे

हमने उन्हें दाना-पानी डाला पर उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। पक्षी और जानवर भी प्यार के भूखे होते हैं। शायद उन्हें पापा के प्यार की आशा थी। आज मेरे पापा इस दुनिया में नहीं हैं पर उनके इस पर्यावरण प्रेम को देखकर मैं आप सभी से ये प्रार्थना करती हूं कि इन गौरैयाओं को लुप्त होने से बचाएं।

रूपाली कुरील, गली नंबर 3, 27 सुंदर नगर, इंदौर

अटपटी-चटपटी

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