नईदुनिया की गौरैया बचाने की मुहिम को जोरदार प्रतिसादUpdated: Sat, 02 Apr 2016 09:59 AM (IST)

इसका प्रमाण है गौरैया के संरक्षण में उठे हजारों हाथ।

इंदौर। क्या आप चाहते हैं कि गौरैया भी विलुप्त पक्षी की श्रेणी में शामिल हो जाए, घर के आंगन में चहचहाने वाली नन्ही सी गौरैया केवल किताबों के पन्नों पर ही सिमटकर रह जाए और मानव सभ्यता के साथ जिसने पंख फैलाए हैं, हमारी वह दोस्त हमेशा के लिए गुम हो जाए। ये सवाल किसी से भी पूछने पर जवाब निश्चित तौर पर 'ना" में ही होगा। इसका प्रमाण है गौरैया के संरक्षण में उठे हजारों हाथ। नईदुनिया द्वारा शुरू की गई मुहिम 'लौट आओ गौरैया" में अब प्रकृतिप्रेमी भी शामिल होने लगे हैं। इसी कड़ी में प्रस्तुत हैं कुछ और भी रचनाएं।

7वीं कक्षा की छात्रा अवनि नाइक ने पोस्टर के माध्यम से न केवल अपनी रचनात्कता को दर्शाया, बल्कि गौरैया को बचाने की अपील भी की है।

'रूठी गौरैया"

रूठ गई हमसे चिरैया

आओ मिलकर उसे मनाएं हम

कारण खोजो निवारण करें

मिलकर उसे बसाएं हम।

ऐसा न हो कि अगली पीढ़ी को

सिर्फ उसकी तस्वीर ही दिखाएं हम

कल कोई बच्चा पूछे कि कहां गई गौरैया

क्यों गायब हो गई तो जवाब नहीं दे पाए हम।

हमने अपनी गलती मानी अपनी भूल पहचानी

अब तो वापस लौट आओ तुम।

-गरिमा उपाध्याय

सी-38/10 ऋषि नगर एक्सटेंशन, उज्जैन

'गौरैया तुम्हें वापस आना होगा"

लौट आओ हमारी प्यारी गौरैया

हम मनुष्य बहुत बेपरवाह निकले

कि तुम्हें सुरक्षित नहीं रख सके

हमारा अपराध क्षमा कर दो

तुम ही नहीं रहोगी

तो हमारा विशाल आसमान किससे चहकेगा

वृक्षों पर, मुंडेरों पर, घर-आंगन में कौन चहकेगा?

प्रकृति और हरियाली की तुम्ही तो हो जान

हमारे पर्यावरण की तुम्ही तो हो शान

अब तुम्हें कोई कुछ नहीं कहेगा

हर कोई तुम्हारा ध्यान रखेगा

तुम आओ और हमारे घरों पे चहचाहाओ

दाना-पानी, खाओ-पियो और उड़ जाओ

लौट आओ हमारी प्यारी गौरैया।

ललित भाटी,

ए-505, एलिट अनमोल

बिचोली रोड, इंदौर

'वो चिड़िया"

मेरे घर की मुंडेर पर रोज आती थी एक चिड़िया मतवाली

रख देता था मैं उसके लिए थोड़ा दाना, थोड़ा पानी

महिने दर महिने बीत गए

असल में ऐसा करते-करते मुझे एक साल बीत गया

ऐसा लगता था जैसे मेरा उनसे कोई रिश्ता है

एक यही रिश्ता है जो बाजारों में नहीं बिकता है

और उस दिन को नहीं भूल सकता हूं मैं कभी

मुझे बधाइयां देने आने लगे थे मेरे अपने सभी

आया था दुनिया में उस दिन था मेरा जन्मदिन

पर बैचेन था दिल मेरा घड़ी की सुइयां गिन-गिन

सुबह से हो गई शाम, बज रहे थे घड़ी में सात

कुछ अजीब लग रहा था क्योंकि नहीं हुई थी आज उनसे बात

वही जो थी मेरी एक मात्र हृदय मित्र

जिनकी आंखों में दिखते थे दुनिया के सारे चित्र

मैं परेशान हो रहा था क्यों नहीं आईं वो आज

तभी अचानक खुल गया मेरे सामने वो राज

जिसका कर रहा था इंतजार वो मेरे सामने आई लहुलुहान

फिर भी आंखें छलकी बची थी उसमें थोड़ी सी जान

किसी ने सही कहा है मुश्किल है जीना उनका जो होते हैं बेजुबान

देखते ही देखते पलभर में मेरे हाथों में वो हो गई बेजान...

-मोहित कुमार श्रीवास

661 ईडब्ल्यूएस विकास नगर, देवास

अटपटी-चटपटी

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