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पैरों को बना लिए 'हाथ', इनसे ही चलाता हूं कार : विक्रम अग्निहोत्रीUpdated: Tue, 14 Nov 2017 11:06 AM (IST)

कई सालों के संघर्ष के बाद आखिर मैं भारत का पहला शख्स बना, जिसे पैरों से कार चलाने का लाइसेंस मिला।

इंदौर, नईदुनिया रिपोर्टर। 'बाल दिवस' और 'वर्ल्ड काइंडनेस डे' के मौके पर संस्था 'क्रिएट स्टोरीज' द्वारा बायपास स्थित एक स्कूल में 'जीने का अंदाज' कार्यक्रम आयोजित किया गया। इसमें पार्टिसिपेंट्स ने मुश्किल परिस्थितियों का दृढ़ता से सामना करते हुए उन पर विजय प्राप्त करने की कहानियां सुनाईं।

संयोजक और संचालक दीपक शर्मा ने कहा कि अगर हमारा हौसला मजबूत और संकल्प दृढ़ हो तो बड़ी से बड़ी बाधा भी रास्ता नहीं रोक सकती है। पेश हैं जीवन की बड़ी से बड़ी चुनौतियों से पार पाने की कुछ ऐसी ही कहानियां, उन्हीं लोगों की जुबानी...

कोशिश करते रहो, कामयाबी आपके पीछे भागेगी

मैंने अपने दोनों हाथ महज 7 साल की उम्र में खो दिए थे। उस हादसे के बाद मैं हर वक्त उदास और गुमसुम रहने लगा था। मगर मेरी मां विजयलक्ष्मी अग्निहोत्री ने मुझमें मुश्किलों का सामना कर जीने का नया हौसला भरा। उनके प्रोत्साहन के चलते मैं फुटबॉल, तैराकी और स्केटिंग जैसे मुश्किल काम आसानी से करने लगा। युवावस्था में मेरी ख्वाहिश कार चलाने की हुई। माता-पिता ने यहां भी मेरी हौसला अफजाई की, मगर नियमों के चलते वो मेरी ख्वाहिश पूरी नहीं कर पा रहे थे। कई सालों के संघर्ष के बाद आखिर मैं भारत का पहला शख्स बना, जिसे पैरों से कार चलाने का लाइसेंस मिला। अब मेरा नजरिया बिलकुल साफ है। विपरीत से विपरीत परिस्थिति में हिम्मत मत हारो। कोशिश करते रहो, कामयाबी खुद आपके पीछे-पीछे भागेगी। - विक्रम अग्निहोत्री

जीने के जज्बे से कैंसर को दो बार हराया

20 साल की उम्र में मेरी शादी हो गई थी । ससुरालवालों को मेरा घर के बाहर काम करना पसंद नहीं था। शादी के करीब दो साल बाद एक दिन पता चला कि मुझे कैंसर है। उस दिन से मेरी जिंदगी वीरान हो गई। मुझे मायके भेज दिया गया। मैं हिम्मत हार चुकी थी, मगर पापा ने इलाज कराने के साथ मेरा हौसला भी बढ़ाया। मेरे पति ने भी साथ निभाया। कैंसर के उस दौर से निकलने के 14 साल बाद मुझे फिर इस गंभीर बीमारी ने घेर लिया। मैं दोबारा कीमो सहन करने की हालत में नहीं थी, लेकिन बेटी जैनब पर मां का साया बनाए रखने की जिद ने मुझमें जज्बा जगाया और मैंने दोबारा कैंसर को हराया। आज सोचती हूं तो ये सब किसी सपने जैसा लगता है। - अमीना सैफी

उतार रहा हूं नेकनीयत डॉक्टर का कर्ज

मेरा जन्म गुजरात के गांव डीसा में हुआ। दादी, मां और बहन फूलमालाएं बनाते थे और मैं भाई और पिता के साथ इनको बेचकर रोटी का जुगाड़ करता था। फीस के पैसे नहीं थे, लेकिन किसी तरह पढ़ाई करता रहा। आखिरकार मेरी लगन देखकर डॉक्टर डीके टैंक ने मेरी पढ़ाई का जिम्मा उठाया और जब तक मैं डॉक्टर नहीं बन गया, उन्होंने मेरा साथ नहीं छोड़ा। उनकी वजह से मैं अपना सपना पूरा कर सका। अब उनके नक्श-ए-कदम पर चलकर मैं हर उस बच्चे को आगे बढ़ाने की कोशिश करता जो जिंदगी में कुछ कर गुजरने का सपना देखता हो । कितने बच्चों की मदद कर चुका हूं, ये आंकड़ा बताना ठीक नहीं है। लेकिन इतना जरूर है कि ये सिलसिला बदस्तूर जारी है। इस तरह मैं डॉक्टर की नेकनीयती का कर्ज उतारने की कोशिश कर रहा हूं। कार्यक्रम के दौरान 'जॉयफुल बैग मुहिम" के तहत जरूरतमंद बच्चों को खुशियों के बैग भी वितरित किए गए। - डॉ. अमित सोलंकी

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