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नईदुनिया सरोकार : भावनात्मक संवाद बना रहना चाहिएUpdated: Fri, 21 Apr 2017 04:45 PM (IST)

जब बच्चा पहली बार स्कूल जाता है तो माता-पिता उसे कुछ दिन तक स्कूल छोड़ने स्वयं जाते हैं।

बच्चों और अभिभावकों में संवादहीनता की स्थिति आज सबसे बड़ी समस्या है। बच्चों को यह समझाने की जरूरत है कि समाज और परिवार में उनका भला चाहने वाले लोगों की बड़ी संख्या है, जरूरत सिर्फ संवाद स्थापित करने की है। बच्चों को यह भरोसा दिलाया जाना चाहिए कि उनकी बातें सुनी जाएगी बस वह कहने की हिम्मत करें। बड़ी संख्या में मिल रही आपके पत्रों से भी यही भावना स्थापित हो रही है। आज पढ़िए संजय वर्मा और चेतना भाटी की चिट्ठी।

प्रिय अभिभावकों एवं बच्चो,

जब बच्चा पहली बार स्कूल जाता है तो माता-पिता उसे कुछ दिन तक स्कूल छोड़ने स्वयं जाते हैं। बच्चे को स्कूल गेट के अंदर जाते देखते हैं। वो रोता है और माता-पिता की आंखों में भी आंसू आ जाते हैं लेकिन खुशी भी होती है कि बच्चा आज से स्कूल गया किन्तु एक फिक्र भी लगी होती है। कैसे बैठा होगा स्कूल में इतनी देर तक। फिर समय पंख लगा कर उड़ता है वह एक क्लास से दूसरी क्लास में पहुंचता जाता है। फिर एक दिन आता है बच्चा कॉलेज पहुंचता है और उसे आगे की पढ़ाई के लिए बाहर के शहरों में जाकर ही पढ़ना पड़ता है और इस सिलसिले में उसे शहर से बाहर भी रहना पड़ता है। माता-पिता अपने मन में झांकें तो जब बच्चा पहली बार स्कूल गया और अब कॉलेज गया दोनों ही बार टीस एक समान ही उठती है।

आंखो में आंसू आते हैं। बच्चों से दूरी सभी को खलती है और जब बच्चे घर से दूर जाते हैं तो भावनात्मक पक्ष हावी होने लगता है और वह माता-पिता की चिंता करने लगते हैं। माता-पिता को भी बच्चों की पढाई की चिंता लगी रहती हैं। कई बार यहीं से समस्या भी बढ़ती है बच्चे भावनात्मक रूप से कमजोर पड़ने लगते हैं। ऐसे वक्त माता-पिता को चिट्ठी भेजकर अपनी कठिनाइयों के बारे में बताना चाहिए ताकि मन का भय दूर जाए। इसके अलावा अपने शिक्षकों को भी वाली कठिनाइयों से अवगत कराकर समाधान करना चाहिए। पढ़ाई में प्रतियोगिता की भावना जरूर होनी चाहिए लेकिन पिछड़ने का अफसोस या कम नंबर आने की बात मन में गांठ बांधकर नहीं रखना चाहिए। - संजय वर्मा

प्यारे बच्चों,

आप ईश्वर की बनाई इस बगिया के खूबसूरत फूल हो। बगिया में सभी फूल एक जैसे नहीं होते लेकिन हर एक की अपनी विशेषता और महत्व होता है। जैसे कि गुलाब की अपनी खुशबू है तो गेंदें की अपनी सुंदरता वैसे ही तुम सब भी हो। जब तुम नन्हें बच्चे थे तो जानते हो तुमने चलना कैसे सीखा था? तुम उठते थे, लड़खड़ाते थे, गिरते थे और फिर कोशिश करते थे। तो समझो कि जीवन भी इसी का नाम है। यहां उठना-गिरना लगा ही रहता है, लेकिन तुम कोशिश करना कभी मत छोड़ना।

बस यही है वह रास्ता है जो तुम्हें मंजिल तक पहुंचाएगा। हम क्यों इन जरा से अंकों के फेर में पड़ें? ये अंक तो इंसानों के गढ़े हैं जबकि तुम्हें परमपिता परमात्मा ने रचा है। मतलब इन चंद अंकों से आप कहीं बड़े हैं, बहुत-बहुत बड़े। इन थोड़े से अंकों की भला क्या बिसात आपके आगे! तुम कोई नंबर नहीं हो क्योंकि तुम तो हो अनंत संभावना वाले अनमोल। - तुम्हारी शुभचिंतक चेतना भाटी

इनसे सीखें जीना : जीवनभर की साधना तब मिला सम्मान

मुंशी प्रेमचंद का नाम देश के सबसे सम्मानित और सफल लेखकों में लिया जाता है। उन्होंने यह सम्मान और सफलता पाने के लिए जिंदगी भर संघर्ष किया और उनकी ख्याति उनके इस दुनिया में न रहने के बाद और ज्यादा बढ़ी। मुंशी प्रेमचंद का जन्म एक गरीब घराने में बनारस के पास लमही नामक गांव में हुआ था। जब वह आठ साल के थे तभी उनकी मां का निधन हो गया।

चौदह साल की उम्र में पिता भी नहीं रहे। ट्यूशन पढ़ा कर उन्होंने किसी तरह अपनी रोजी-रोटी चलाई। लेकिन तमाम विपरीत परिस्थितियों से घबराए बिना उन्होंने इन्हें ही पनी साहित्य साधना का जरिया बनाया और दुनिया के महान लेखकों में अपना नाम लिखवाया।

अटपटी-चटपटी

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