सर्वे : नशे की गिरफ्त में फंसे 9 से 16 साल की उम्र के बच्चेUpdated: Wed, 15 Nov 2017 10:46 AM (IST)

बाल दिवस पर विभिन्न् स्थानों पर रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित हुए।

इंदौर, नईदुनिया रिपोर्टर। बाल दिवस पर विभिन्न् स्थानों पर रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित हुए। इससे इतर शहर के कुछ शिक्षकों द्वारा शहर की तंग बस्तियों में रहने वाले 9 से 16 साल के बच्चों पर किए गए सर्वे में भयावह तस्वीर सामने आई है।

सर्वे के मुताबिक सरवटे बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन, शास्त्री ब्रिज, गांधी हॉल, गंगवाल बस स्टैंड, कर्बला पुल के पास रहने वाले बच्चे नशे के गुलाम बन रहे हैं। ऐसे दर्जनों स्थान है । केवल 10 जगह पर ही 295 बच्चे नशे के चंगुल में फंसे मिले। जबकि शहर में ऐसे स्थानों की संख्या कई गुना ज्यादा है। ऐसे में नशाखोरी के कुचक्र में फंसे मासूमों की संख्या हजार का आंकड़ा भी पार कर सकती है। ऐसे में यह तस्वीर कई मायने में बाल दिवस मनाने की प्रासंगिकता पर भी सवाल खड़े करती है।

90 प्रतिशत बच्चे 'सिंगल पैरेंट्स' के

जिला जेल में महिला बंदियों के बच्चों के स्कूल की शिक्षिका विनीता तिवारी के मुताबिक ये बच्चे गांजा, भांग का सेवन करने से लेकर ह्वाइटनर, सॉल्यूशन, पेट्रोल, डीजल सूंघने के आदी भी हो चुके हैं। इनमें से 90 प्रतिशत बच्चे सिंगल पैरेंट्स वाले हैं। किसी की मां नहीं तो किसी के सिर पर पिता का साया नहीं है। पैरेंट के काम पर जाते ही तंग बस्तियों और झोपड़ियों में रहने वाले ये बच्चे नशे की जुगाड़ में जुट जाते हैं। कहने को ये बच्चे स्कूल भी जाते हैं, लेकिन तीसरी से आठवीं कक्षा में पढ़ रहे इन बच्चों को अक्षर ज्ञान तक नहीं है। सफाई में नंबर वन शहर के इन मासूमों को साफ-सफाई से दूर-दूर कोई वास्ता ही नहीं है।

बर्बादी की जड़, बड़ों की शराबखोरी

सिंगल पैरेंट वाले बच्चों में उनकी संख्या ज्यादा है, जिनके पिता अकेले हैं। हर रात शराबखोरी करने वाले पिता के चलते बच्चों पर अंकुश लगाने वाला कोई नहीं है। सामाजिक स्तर पर भी ये सिर्फ अपने जैसे नशा करने वालों के साथ ही सरोकार रखते हैं। समाज का सभ्य तबका भी इन्हें गंदगी, विचित्र व्यवहार और खराब भाषा के चलते पास नहीं फटकने देता है।

संवेदना-शून्य और क्रोधी बना रहा नशा

सर्वे करने वाले शिक्षकों के मुताबिक नशा इन बच्चों को संवेदना-शून्य स्थिति में ले जा रहा है। इनका स्वभाव क्रोधी और चिड़चिड़ा होता जा रहा है। नशे के लिए पैसे न मिलने पर ये अपराध करने से भी नहीं झिझकते हैं। शिक्षिका विनिता तिवारी के मुताबिक पढ़ाई, खेल और खान-पान की समुचित व्यवस्था की जाए तो इन बच्चों को सही राह पर लाया जा सकता है।

तीन साल में बढ़े 40 फीसदी मामले

क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉ. संजीव त्रिपाठी के मुताबिक नशे की लत बच्चों में तेजी से बढ़ रही है। तंग बस्तियों के अलावा कई बड़े घर और नामी स्कूलों के बच्चे भी नशे की गिरफ्त में फंस रहे हैं। महज तीन सालों में ही ऐसे पेशेंट्स की संख्या 40 से 50 फीसदी तक बढ़ गई है। ऐसे बच्चों को सुधारने में पैरेंट्स को अहम जिम्मेदारी निभाना होती है। वो अपने बच्चे के बारे में जितना अलर्ट रहेंगे, उसके भटकने के चांस उतने कम होंगे। जितनी जल्दी उसकी नशे की लत का पता चलेगा, उसे सुधारना भी उतना आसान होगा।

असरदार संवाद से सुधरेंगे हालात

ख्यात शिक्षाविद् तपन भट्टाचार्य का मानना है कि इन दुश्वार हालात को सुधारने की पहल असरदार संवाद से ही करना होगी। इसके लिए हमें उनकी सोच के मुताबिक बात करना होगी । इन बच्चों के साथ एक दिक्कत ये भी है कि कई बच्चे अपनी उम्र से अधिक उम्र के शख्स की तरह व्यवहार करने लगते हैं। इसलिए हर एक बच्चे के साथ उसके हिसाब से चर्चा करना होगी। उन्हें प्रताड़ित करने के बजाय स्पेशल क्लासेस लगाई जाएं और उनके परिवार की गरीबी दूर करने के समुचित उपाय किए जाएं तो हालात सुधर सकते हैं।

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