'माॅम'Updated: Fri, 07 Jul 2017 02:46 PM (IST)

ऐसी फिल्मों में तालियां बटोरने की क्षमता होती है। यह बात अलग है कि ‘आंख के बदले आंख’ पूरी दुनिया को अंधा बना सकती है।

एक प्रचलित और पुरातन लोकोक्ति है, ‘भावनाओं का सबसे पवित्र प्रकार बदला है’। सिने इतिहास के आगाज से लेकर अंत तक भावनाओं के इसी किस्म का महत्‍तम दोहन होता रहा है। श्रीदेवी की 300 वीं फिल्म इसी को केंद्र में रखकर बुनी गई है। ऐसी फिल्मों में तालियां बटोरने की सबसे ज्यादा क्षमता होती है। यह बात अलग है कि ‘आंख के बदले आंख’ इस दुनिया को अंधा बना सकती है। इस की सघन व्‍याख्‍या के जहान में सिने कहानीकार बचते रहे हैं। वह शायद इसलिए कि काव्‍यात्‍मक न्‍याय भीड़ को अपील करती है। खासतौर पर ऐसे समाज से ताल्‍लुक रखने वाली भीड़ को, जिन्हें व्‍यवस्था से न्‍याय मिलने में अंतहीन इंतजार करना पड़ता है। जहां सही और गलत तो दूर, गलत व बहुत गलत के बीच चीजों को चुनने की जिम्‍मेदारी है।

दुर्भाग्‍य से तीसरी दुनिया के देशों में सिस्टम इसी तर्ज पर काम करने को मजबूर है। देवकी दिल्ली के इंटरनेशनल स्कूल में जीवविज्ञान की टीचर है। आर्या उसकी सौतेली बेटी। आर्या दरअसल देवकी को सगी मां का दर्जा नहीं दे पा रही है। पिता आनंद के लाख समझाने के बावजूद। देवकी सुलझी हुई शख्सियत है। समझाने से ज्यादा जोर आर्या को समझने पर है। सरल शब्दों में कहें तो आर्या के तेवर बगावती हैं, जैसे आमतौर पर उस उम्र के किशोर होते हैं। वह वैलेंटाइन्‍स डे की पार्टी में जाती है, जहां दो बिगड़े हुए शहजादे मोहित व प्रिंस दीवान एक गार्ड और अपराधी जगन के साथ मिलकर उसका सामूहिक बलात्‍कार करते हैं। दिल्ली की सड़कों पर बंद गाड़ी में। गला दबाकर उसकी बॉडी एक नाले में फेंक देते हैं।

सबूतों के अभाव में वे निचली अदालत से छूट जाते हैं। यहां से देवकी का भरोसा कानून से उठ जाता है। पति आनंद कानूनी लड़ाई में मशगूल रहता है। देवकी दूसरी तरफ जंग की कमान अपने हाथ में ले लेती है। फिर शुरू होती है बदले की महागाथा। प्राइवेट जासूस डीके की मदद और अपने जीवविज्ञान के ज्ञान से वह एक-एक कर सब को ऊपर पहुंचाना शुरू करती है। इससे क्राइम ब्रांच के अफसर मैथ्‍यू फ्रांसिस के शक की सूई देवकी पर जाती है। शतरंज के शह व मात का खेल चलता रहता है।

निर्देशक रवि उदयवार प्रभावी सीन गढ़ने में खासे सफल रहे हैं। बैकग्राउंड स्कोर की मदद व कैमरे के एरियल शॉट ने उसे और निखारा है। खासकर, जब आर्या के साथ काली शीशे वाली गाड़ी रात के अंधेरे में दिल्ली की सड़कों पर चल रही होती है तो लगता है कि मौत तांडव कर रही है। इंसानियत का नंगा नाच व खूनी खेल पूरी बेशर्मी से पसरा हुआ है। यह एपिक शॉट में शुमार होने की काबिलियत रखता है। साथ ही श्रीदेवी, नवाजुद्दीन सिद्दीकी, सजल अली और अदनान सिद्दीकी की सधी हुई अदाकारी ‘मास ऑडिएंस’ में भावनाओं का ऊफान आसानी से ला सकती है। सिनेमाई भाषा में इसे ‘मैनिपुलेशन’ कहा जाता है।

सबूतों के अभाव का जो तर्क फिल्म पेश किए गए हैं, वे हॉलीवुड के कोर्टरूम ड्रामा जॉनर की फिल्मों में अक्सर मौजूद रहते हैं। कि वीर्य व ऊंगलियों के निशान मिटा दिए गए तो अदालत कुछ नहीं कर सकती। बहरहाल, फिल्म पूरी तरह श्रीदेवी और नवाज के कंधों पर है। देवकी व डीके के रोल में उन दोनों का काम सराहनीय है। देवकी की देहभाषा व बोल-चाल असल श्रीदेवी जैसी ही रखी गई है। तमिल के आंचलिक प्रभाव से मिश्रित हिंदी। डीके के गेटअप और आवाज से नवाज पहचान में नजर नहीं आते।

सजल अली ने आर्या की बगावत व दर्द को बखूबी पेश किया है। अदनान सिद्दीकी की स्‍क्रीन मौजूदगी जादुई है। हालांकि इन सब चीजों के बावजूद फिल्म की कहानी बड़ी प्रेडिक्‍टेबल सी बन गई है। इससे यह आला दर्जे की थ्रिलर बनते-बनते रह गई है। गानों के बोल और सीन के फिल्माने में उपयुक्त गहराई झलकती है। पर लेखक-निर्देशक के काव्‍यात्‍मक न्‍याय के मोह के चलते फिल्म कालजयी नहीं बनी है।

-अमित कर्ण

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