'इत्तेफाक'Updated: Fri, 03 Nov 2017 12:41 PM (IST)

इसे जल्द से जल्द देखना बनता है क्योंकि राज बता कर मजा बिगाड़ने वाले कम नहीं हैं।

सस्पेंस का रीमेक... ये विचार ही बता देता है कि निर्देशक के पास सुनाने के लिए कोई बेहतर कहानी है। 'इत्तेफाक' देखकर इस बात पर यकीन भी हो जाता है।

'इत्तेफाक' को लगभग 50 साल बनाना वाकई बड़ा चैलेंज था। ये सस्पेंस फिल्म एेसी है जिसे लगभग हर पीढ़ी ने देखा है। आखिर राजेश खन्ना की सफलता से दोस्ती इसी फिल्म से हुई थी। 2017 में जो कहानी निर्देशक अभय चोपड़ा दिखा रहे हैं, वो अलग नहीं है। इसे देखकर पुरानी 'इत्तेफाक' की याद आती है और सबसे अच्छा है कि ये ज्यादा मजेदार है। इसमें और ट्विस्ट हैं।

डबल मर्डर का मामला है। पुलिस को सिद्धार्थ मल्होत्रा और सोनाक्षी सिन्हा दोनों पर शक है। केस की जांच कर रहे अक्षय खन्ना के विचार पर दौड़ती ये फिल्म कभी सोनाक्षी पर शक पक्का करती है, तो कभी सिद्धार्थ को दोषी करार देती है। दौड़ती इसलिए कि .... केवल डेढ़ घंटे में ये खत्म हो जाती है। एक भी सीन मिस किया तो मजा तो जाएगा ही, माहौल भी खत्म हो जाएगा।

अक्षय खन्ना ने इसमें काफी जगह घेरी, इसलिए उन्हीं को हीरो मान लेते हैं। एक्टिंग के मामले में तो वो सबसे आगे हैं ही। अक्षय ही हैं जो इस फिल्म को जिंदा रखे रहते हैं। शुरुआती पौन घंटा क्राइम सीन पर बितता है और एक ही बात को अलग-अलग लोगों से देखना खूब बोर करने वाला हो सकता था, अक्षय ने यहां बचा लिया। अक्षय की बातों से आपके चेहरे पर डबल मर्डर के बावजूद मुस्कुराहट रहती है। ये जरूरी था... नहीं तो अंत देखने के लिए सिनेमाघर में कोई बचता ही नहीं। कितना भी शानदार क्लाइमैक्स हो... देखने के लिए लोग तो होना चाहिए! अक्षय भले ही क्लाइमैक्स में हार गए, लेकिन दर्शकों को बैठाए रखने के मामले में उनकी जीत सबसे बड़ी है।

अंत तो टिकट खरीद कर ही देखिएगा। अभी बस इतना जान लीजिए कि ये वाकई मजेदार है। इसका अंदाजा आप लगा सकते हैं, लेकिन हत्या से जुड़े राज तो कातिल की जुबानी ही समझ आएंगे। इसे जल्द से जल्द देखना बनता है क्योंकि राज बता कर मजा बिगाड़ने वाले कम नहीं हैं।

- सुदीप मिश्रा

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