'गेस्ट इन लंदन-लो आ गया मेहमान'Updated: Fri, 07 Jul 2017 05:17 PM (IST)

लेखक-निर्देशक अश्विनी धीर ने इस पेशकश में मध्‍य वर्गीय परिवार से लेकर वैश्विक परिवार के ताने-बाने को गूंथने की कोशिश की है।

लेखक-निर्देशक अश्विनी धीर ने इस पेशकश में मध्‍य वर्गीय परिवार से लेकर वैश्विक परिवार के ताने-बाने को गूंथने की कोशिश की है। वजह फिल्‍मकारों को इन दिनों महसूस होने वाली एक बात है। वह यह कि दर्शकों के दिलों को अब जीवन से बड़े मुद्दे अपील करते हैं। फिल्म विशेष में सरलतम विषयों से उनका मोहभंग हो चुका है। उन्हें बहुपरतीय किस्‍सागोई करने वाले किरदारों की तलाश रहती है। यह फिल्म उसी अभिप्राय की अभिव्‍यक्ति है। तभी परदेस में खुद की जमीन तलाश रहे नायक की जिंदगी में बिन बुलाए मेहमान की हरकतों से पैदा हुई मुश्किल किसी और चीज की शक्‍ल ले लेती है।

मध्‍यवर्गीय परिवार की आदतें अचानक लंदन में दक्षिण एशिया की राजनीति पर प्रहसनात्‍मक स्‍टैंड लेने लग जाती हैं। घटनाक्रम कहानी को लंदन से अमेरिका ले जाता है, जहां मध्‍य पूर्व एशिया में स्‍वार्थपरक राजनीति के प्रतिकार के जख्‍म हैं। बहरहाल, नायक आर्यन ग्रोवर लंदन में वर्किंग वीजा पर काम कर रहा है। स्‍थायी रूप से रहने के लिए वह कैब ड्राईवर अनाया से फर्जी शादी का नाटक रचता है। इस आधार पर वहां की सरकार आप्रवासियों को कई तरह की सुविधाएं देती है। खैर शादी फर्जी है कि असल, इसका पता लगाने का जिम्‍मा पाकिस्तानी अफसर हबीबी पर है। संयोग से उसका घर आर्यन-अनाया के पड़ोस में ही है। हबीबी की बीवी वेस्टइंडीज की है। आर्यन का बॉस आत्‍ममुग्‍ध मिजाज का है। अपने मातहत काम करने वाली चाइनीज लड़की पर डोरे डालता रहता है। इन सबके बीच अ‍तिथि गंगा शरण गणोत्रा की एंट्री होती है। बीवी गुड्डी के साथ। बाद में पता चलता है कि गुड्डी का असल नाम शाजिया है।

गंगा शरण अपनी एकाध हरकतों को छोड़ बाकी आदतों से आर्यन, उसके बॉस व अनाया का दिल जीतने लग जाता है। तभी एक मोड़ आता है, जहां आर्यन को नौकरी छोड़नी पड़ती है। कहानी प्रहसन की बजाय सघन भावुकता के सागर में गोते लगाने लग जाती है। अश्विनी धीर मध्‍य वर्गीय परिवार की खूबियों-खामियों व उसके अंतस से भली-भांति वाकिफ हैं। आर्यन, अनाया, गंगा शरण गणोत्रा व गुड्डी के जरिए उन्होंने दो पीढि़यों के सोच-अप्रोच को बारीकी से रखा है। बचपन के कड़े अनुभवों से गुजरी अनाया को गंगा-गुड्डी का स्‍वार्थहीन दुलार बदलने पर मजबूर करता है। वह महसूस करने लग जाती है कि जिंदगी छोड़ने का नहीं, जोड़ने का नाम है। गंगा-गुड्डी का फलसफा रिश्‍तों व करियर के भंवरजाल में फंसे आर्यन को संबल देता है। कदम फूंक-फूंक कर चलने की बजाय जोखिम लेना सीखा जाता है। हां, पाकिस्तान व चीन पर जो चुटकुले गढ़े गए हैं, वे सतही हैं। लगता है कि अंध राष्‍ट्रवाद के हिमायती को खुश करने के ख्‍याल से रचे गए हैं। ऊपर से तुर्रा यह कि उन चुटकुलों पर हबीवी जवाबी हमला नहीं करता है। इस तरह मामला एकतरफा हो गया है।

क्‍लाइमेक्‍स से ठीक पहले फिल्म लंदन से अमेरिका चली जाती है। वहां अजय देवगन का कैमियो है। उस मोर्चे पर कुछ ज्यादा सिनेमाई आजादी ले ली गई है। पंजाबियों को दिखे-दिखाए ढर्रे पर ही पेश किया गया है। आर्यन ग्रोवर के अवतार में कार्तिक आर्यन जंचे हैं। उन्होंने नायक के द्वंद्व, मुश्किलों, गम व खुशी को अतिरंजित नहीं होने दिया है। अनुशासित कलाकार की तरह उन्होंने भावनाओं को जाहिर किया है। अयाना बनीं कृति खरबंदा खूबसूरत लगी हैं। किरदार के उतार-चढ़ाव के साथ उन्होंने न्याय किया है।

गुड्डी के रूप में एक पतिव्रता नारी को तन्‍वी आजमी ने बखूबी चित्रित किया है। पति की ‘पाद’ तक को गुड्डी अपने रटे-रटाए बहाने से कवर अप करती रहती है। गंगा शरण के रोल में परेश रावल की मौजूदगी दमदार है। ‘नस्लभेदी’ टिप्पणियों से लैस चुटकलों से वे परहेज कर सकते थे। संजय मिश्रा ने हबीबी को दिलचस्प बनाया है। समर्थ कलाकारों के बावजूद दिक्कत लेखन से हो गई है। संवादों में रचनात्‍मकता का पुट होने के बावजूद हंसी चेहरे पर नहीं पसर पाती है।

अटपटी-चटपटी

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