टॉयलेट एक प्रेम कथाUpdated: Fri, 11 Aug 2017 03:46 PM (IST)

भारतीय समाज की इस बुराई को जिसे बोलने में भी एक झिझक होती है, इसी मुद्दे पर फ़िल्म बनाने का प्रयास सराहा जाना चाहिए।

मुख्य कलाकार: अक्षय कुमार, भूमि पेडनेकर, अनुपम खेर, दिव्येंदु शर्मा, सुधीर पाण्डेय आदि।

निर्देशक: श्री नारायण सिंह।

निर्माता: वायकॉम 18 मोशन पिक्चर्स।

अवधि: 2 घंटा 41 मिनट।

'टॉयलेट: एक प्रेम कथा', नाम से ही ज़ाहिर होता है कि कहानी टॉयलेट के इर्द-गिर्द बुनी गई है। केशव (अक्षय) का प्यार परवान चढ़ता है जया (भूमि पेडनेकर) के साथ। शादी भी हो जाती है, लेकिन सुहागरात की ही अलसुबह जब दूसरी महिलाएं जया को लोटा पार्टी के लिए आमंत्रित करती हैं तो जया को पता लगता है कि घर में शौचालय नहीं है। शौच के लिए सारी औरतों को खुले में, खेत में दिन निकलने से पहले ही जाना पड़ता है। ऐसे में जया केशव को साफ़-साफ़ मना कर देती है कि उसने बचपन से आजतक हमेशा घर में बने शौचालय का ही इस्तेमाल किया है, इसलिए वो खुले में नहीं जाएगी।

केशव के पिता एक ब्राह्मण हैं जो परम्पराओं के खिलाफ जिस आंगन में तुलसी की पूजा होती है वहां शौचालय बन ही नहीं सकता की जिद पर अड़ जाते हैं। पंचायत भी इसके खिलाफ़ हो जाती है कि शौचालय नहीं बनेगा। ऐसे में केशव पत्नी के प्रेम में क्या-क्या करते हैं, इसी धागे पर बुनी गई है - टॉयलेटः एक प्रेम कथा।

प्रियंका भारतीय जिसने अपने पति का घर इसी कारण छोड़ा था। उसी की कहानी इस फ़िल्म की प्रेरणा है। उसके बाद भी उत्तरप्रदेश की पारो देवी, बिहार की सुनीता, यूपी की ही अर्चना, मध्यप्रदेश की अनीता जैसे उदाहरण भी सामने आए जिन्होंने ससुराल में खुले में शौच जाने से साफ़ इन्कार कर दिया।

फ़िल्म 'टॉयलेट: एक प्रेम कथा' निश्चित तौर पर एक ईमानदार प्रयास है। आज भी भारत के कई हिस्सों में महिलाओं को मुंह अंधेरे खुले में शौच के लिए जाना पड़ता है। इसके कई तर्क दिए जाते हैं। मगर, महिलाओं की अस्मिता, साफ़-सफाई, बीमारियों आदि के मुख्य कारण भी खुले में शौच को ही माना गया है। इस मुद्दे पर फ़िल्म बनाने के लिए श्री नारायण सिंह साधुवाद के पात्र हैं।

क्यों देखें: भारतीय समाज की इस बुराई को जिसे बोलने में भी एक झिझक होती है, इसी मुद्दे पर फ़िल्म बनाने का प्रयास सराहा जाना चाहिए। साथ ही यह फ़िल्म अक्षय कुमार और भूमि पेडनेकर के शानदार परफॉर्मेंस के लिए देखी जा सकती है।

क्यों न देखें: फ़िल्म अनावश्यक रूप से काफी लंबी है। इंटरवल तक फ़िल्म बोझिल हो जाती है। दृश्यों का दोहराव इंटरवल की तरफ़ मन ज्यादा खींचता है। स्क्रीनप्ले पर और मेहनत की जानी चाहिए थी। सिनेमेटोग्राफी भी और बेहतर होती तो फ़िल्म दर्शनीय बन पाती। टॉयलेट के लिए दिन में जाती महिलाएं दृश्य की ज़रूरत थी पर इससे लॉजिक को गहरा आघात लगता है।

वर्डिक्ट: 'टॉयलेट: एक प्रेम कथा' ईमानदार मुद्दे पर आधारित एक सामान्य फ़िल्म है, जिससे काफी उम्मीदें की जा रही थीं। अगर आप मुद्दे पर आधारित फ़िल्म देखना चाहते हैं तो आपको टॉयलेट एक प्रेम कथा पसंद आएगी।

- पराग छापेकर

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