'बारात कंपनी'Updated: Fri, 28 Jul 2017 05:06 PM (IST)

मुख्‍य किरदारों के साथ-साथ सहयोगी भूमिकाएं भी रोचक बनाने की भरसक कोशिश की गई है।

सैय्यद अहमद अफजाल की ‘बारात कंपनी’लखनऊ के युगलों की प्रेम कहानी है। ठेके पर जबरन दूसरों की शादी करवाने वाले ईमान सिंह यानी इम्‍मु व दिल्‍ली से वहां लौटी महक के बीच की। ईमान अपनी टोली के दोस्त दिलजला, जैक्‍सन और रानी के सहयोग से वैसी शादियों को अंजाम देता है। इम्‍मु का वह पुश्‍तैनी काम है। इसमें उसके दद्दा की खुली छूट है। महक अपनी जिगरी सहेली यास्मिन मिर्जा की शादी भगाकर करवाने के लिए लौटी है। यास्मिन के भाई महताब ने वह रोकने का जिम्‍मा इम्‍मु को दिया है। वह वैसा कर भी देता है। वहां महक के प्रबल विरोध से वह प्रभावित हो जाता है। वह महक को दिल दे बैठता है।

इस हकीकत के बावजूद कि दोनों की अलग जगहों पर शादियां तय हैं। महक अपने द्वंद्व का हल तलाश पाने में नाकाम है। कि वह मंगेतर अभय से किया वादा तोड़ इम्‍मु के साथ जाए या नहीं। फिर क्या कुछ होता है, उन सिलसिलों को कहानी की शक्‍ल देते हुए अफजाल ने एक रोमांटिक कॉमेडी गढ़ी है। फिल्‍म में लखनऊ के लहजे और नफासत का पुट है। मुख्‍य किरदारों के साथ-साथ सहयोगी भूमिकाएं भी रोचक बनाने की भरसक कोशिश की गई है। दिलजला व रानी अपने भावों से आवश्‍यक हास्य पैदा करने में सफल हुए हैं। बाकी किरदार दिल छूते-छूते रह गए हैं। महताब के खौफ से यास्मिन को बचाने की जो भागमभाग दिखाई गई है, उनके रोचक व रोमांचक बनने की ओर गुंजाइश रह गई है।

इम्‍मु से लेकर शेष सभी किरदारों पर ठहराव कुछ ज्यादा हावी हो गया है। इससे उन भूमिकाओं को खुल कर सांस लेने व खेलने का मौका नहीं मिला है। वे पटकथा की सीमाओं में घुट से गए हैं। उनका योगदान नजर नहीं आता। यह उभरते हुए शहरों में लड़के-लड़कियों के संबंधों और व्‍यवहार पर दिलचस्‍प टिप्‍पणी है। वह रोचक व प्रेरक बनने रह गई है। बदलते घटनाक्रमों में आवश्‍यक रफ़तार नहीं है। वे बोझिल से हो गए हैं। अफजाल ने नवोदित कलाकारों के साथ किरदारों को रचा है। नायक इम्‍मु के तौर पर रणवीर कुमार व अभय बने विशाल करवल की स्‍क्रीन मौजूदगी अच्छी है। हालांकि उन्हें अदायगी पर अभी और रियाज की दरकार है।

महक में संदीपा धर व यास्मिन में अनुरित्‍ता के झा ने खूबसूरती के रंग भरे हैं। दिलजला के रोल को कुमार सौरभ व रानी की भूमिका को जयहिंद कुमार ने स्‍तरीय बनाया है। वे फिल्‍म की खोज हैं। दद्दा के किरदार में अनिल रस्तोगी ‘इश्‍कजादे’ वाले दद्दा ही कमोबेश लगे हैं। दरअसल रोमांटिक कॉमेडी जॉनर बदलते हुए परिवेश में अपनी जमीन तलाश रहा है। प्यार के इजहार से लेकर युवाओं का दिल क्‍या ढूंढ रहा है, वह प्रभावी तौर पेश करना चुनौतीपूर्ण है। उस चुनौती को यहां जवाब मिला है, पर वह करारा नहीं हो पाया है। संवादों के जरिए तो कम से कम नहीं। गानों ने जरूर कसक पूरी करने की कोशिश की है। पटकथा के ढीलेपन से बात नहीं बन पाई है।

- अमित कर्ण

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