बादशाहोUpdated: Fri, 01 Sep 2017 12:27 PM (IST)

'बादशाहो' एेसी है कि ड्रेस सर्कल में बैठे कई-कई बार सीटी बजाएं लेकिन परिवारों के लिए इसमें कुछ खास नहीं है।

फिल्मी दुनिया में चंद निर्देशक ही एेसे हैं जो सिंगल सिनेमा के दर्शकों का ध्यान रख रहे हैं। मिलन लूथरिया एेसे ही हैं। उनकी फिल्म 'बादशाहो' एेसी ही है कि ड्रेस सर्कल में बैठे लोग कई-कई बार सीटी बजाएं लेकिन परिवारों के लिए इसमें कुछ खास नहीं है।

मल्टीस्टारर फिल्म की कहानी एक शाही खजाने से जुड़ी है। ये खजाना महारानी बनी इलियाना डिक्रूज का है, जो वे नहीं चाहतीं कि सरकार के पास जाए। देश में इमरजेंसी लग चुकी है और हुक्मरान मौके का फायदा उठाने की फिराक में हैं। इलियाना की गिरफ्तारी हो चुकी है और खजाने को सरकार दिल्ली ला रही है। इलियाना को भरोसा है वफादार बॉडीगार्ड अजय देवगन पर। अजय टीम बनाते हैं जिसमें ईशा गुप्ता, संजय मिश्रा और इमरान हाशमी हैं। ये खजाने को लूटकर महारानी को देने के मिशन पर हैं। उधर सरकार आर्मी को ये जिम्मेदारी सौंपती है और आर्मी ने ये काम सौंपा है विद्युत जामवाल को। मामला सेट है... अब कहानी की परतें खुलना शुरू होतीं हैं जो कुछ अच्छी हैं और कुछ बेहद बोरिंग।

मिलन लूथरिया ने डायलॉग्स वाला पत्ता भी खेला है। कई तो वाकई मजेदार है। कुछ स्तरहीन हैं। फिर भी ये वो माहौल बना देते हैं, जो मसाला फिल्मों के दर्शकों को चाहिए। इमरान रही-सही कसर पूरी कर देते हैं। इमरान की एंट्री पर अजय से ज्यादा तालियां-सीटी बजीं। वाकई उनको चाहने वाले खूब हैं। इंटरवेल के पहले वाला हिस्सा इमरान के नाम है। इसी खाते में सनी लिओनी का अायटम नंबर भी आ जाता है। ये हिस्सा तो कई वजहों से आसानी से निकल जाता है। हालत खराब होती है समोसे-पॉपकॉर्न ब्रेक के बाद।

इंटरवेल के बाद मिलन ने मिशन को बेहद बुरी तरह फिल्माया। उनकी कोई तैयारी नहीं थी। जैसा मन किया, वैसा फिल्मा दिया। देखने वालों को वो-वो बातें बताईं जिन पर वे कभी यकीं नहीं करें। अंत तो बेहद खराब है। रेगिस्तानी तूफान में लड़ाई देखना अब किसको अच्छा लगता है!

आखिर तक पहुंचते-पहुंचते ये फिल्म बार-बार घड़ी देखने पर मजबूर कर देती है। मल्टीप्लेक्स जाने वालों के पास इतना सब्र होगा... शक है। एक्टिंग के मामले में संजय मिश्रा सब पर भारी हैं और ईशा गुप्ता सबसे कमजोर। अजय और इमरान बराबरी से फिल्म खींचने की कोशिश करते हैं, पर कहानी इतना भारी है कि ये भी थक जाते हैं। अच्छा यह है कि दो-तीन गाने हैं, जो थोड़ा सुकून दे देते हैं।

- सुदीप मिश्रा

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