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संपादकीय : वैश्विक आर्थिक चुनौतियों पर जरूरी चिंतनUpdated: Tue, 08 Sep 2015 10:36 PM (IST)

पीएम की उद्योग जगत के प्रतिनिधियों के साथ हुई बैठक से ये जरूर हुआ कि दोनों पक्षों को एक-दूसरे की अपेक्षाएं समझने में मदद मिली।

उद्योग व कारोबार जगत के बड़े नामों के साथ बैठकर विचार-विमर्श की शुरुआत तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने तब की थी, जब अर्थव्यवस्था की विकास दर गिरने लगी थी। अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने 15 महीनों के कार्यकाल के बाद ऐसी बैठक तब बुलाई, जब आर्थिक क्षितिज पर आशंकाओं के बादल मंडरा रहे हैं। किंतु फर्क यह है कि डॉ. सिंह ने जब ये पहल की, तब तक यूपीए-2 सरकार की नीति-निर्णय संबंधी क्षमता के पंगु होने की धारणा व्याप्त हो गई थी, जबकि मोदी के नेतृत्व में अर्थव्यवस्था के पटरी पर लौटने की उम्मीदें अभी बची हुई हैं। मगर चिंताजनक समान पहलू यह है कि तब भी अर्थव्यवस्था के सामने मौजूद चुनौतियों के मुख्य कारण देश के बाहर थे, और आज भी वैसा ही है।

फिलहाल चीन के आर्थिक संकट तथा अमेरिकी अर्थव्यवस्था में सुधार ने भारत जैसे उभरती अर्थव्यवस्था वाले देशों के सामने कठिन मुश्किलें खड़ी कर दी हैं। प्रधानमंत्री की पहल का उद्देश्य इस बिंदु पर ही विचार-विमर्श करना था कि क्या वैश्विक चुनौतियों को भारत अपने लिए अवसर बना सकता है? इस पर चर्चा के लिए उद्योगपति और मोदी व उनके मंत्री आमने-सामने बैठे। बातचीत का जो ब्योरा सामने आया है कि उसका सार यही है कि सरकार और उद्योग जगत दोनों को एक-दूसरे से ऊंची अपेक्षाएं हैं। प्रधानमंत्री ने जोखिम उठाने और निवेश बढ़ाने की जरूरत बताई, तो उद्योगपतियों ने ब्याज दरों में कटौती तथा कारोबार करना आसान बनाने के लिए नीतिगत कदम उठाने पर जोर डाला।

सरकार ने बताया कि भारतीय अर्थव्यवस्था की बुनियाद मजबूत है। इसलिए मौजूदा वैश्विक उथल-पुथल का सबसे कम असर भारत पर ही होगा। यह वो तथ्य है, जिसे अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसी संस्थाओं ने भी माना है। इसके बावजूद हकीकत यह है कि मांग और निवेश नहीं बढ़ रहे हैं। कंपनियों का मुनाफा गिरा है। इस वित्त वर्ष की पहली तिमाही में जीडीपी की वृद्धि दर भी गिरी। शेयर बाजार में भी ग्रहण लगता दिख रहा है। इन हालात में उद्योग जगत का उत्साह कुछ ठंडा पड़ा है। उसकी सरकार से कुछ शिकायतें भी हैं।

भूमि अधिग्रहण बिल पर सरकार का यू-टर्न, जीएसटी बिल पास न होना, श्रम सुधारों पर प्रगति न होना, कर मामलों में अपेक्षित स्पष्टता न आना और सबसिडी में भारी कटौती न होना उसकी प्रमुख चिंताएं हैं। मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया, स्मार्ट सिटी जैसी प्रधानमंत्री की प्राथमिकताओं से उद्योग जगत खुश तो है, लेकिन वह इन पर तीव्र गति से अमल तथा ठोस उपलब्धियां चाहता है। इसीलिए कारोबारी मांगों की लंबी सूची लेकर आए।

सकारात्मक बात यह है कि इस बैठक से दोनों पक्षों को एक-दूसरे की अपेक्षाएं समझने में मदद मिली। लेकिन इससे भारत को अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संकट से बचाने, अथवा संकट को अवसर में तब्दील करने में कितनी मदद मिलेगी, इस बारे में अभी कुछ कहना कठिन है।

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