संपादकीय : धांधलेबाजी पर शिकंजाUpdated: Wed, 17 May 2017 10:08 PM (IST)

चिदंबरम अथवा लालू या अन्य नेता यदि खुद के निर्दोष होने को लेकर आश्वस्त हैं, तो उन्हें भारतीय न्याय प्रक्रिया पर भरोसा रखना चाहिए।

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी. चिदंबरम के बेटे कार्ती चिदंबरम के ठिकानों और राष्ट्रीय जनता दल के अध्यक्ष लालू प्रसाद की कथित बेनामी संपत्तियों पर छापों के बाद वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा कि 'हिसाब-किताब के दिन आ गए हैं। एक साथ अनेक ठिकानों पर कार्रवाई का बचाव करते हुए उन्होंने कहा कि जिन लोगों ने गड़बड़ी की है, उन्हें जवाब देना ही होगा। उन्होंने बताया कि सत्ता में बैठे लोग बेनामी कंपनियों के जरिए संपत्ति खरीद रहे हैं। यह मामूली बात नहीं है। सरकारी पक्ष के मुताबिक सीबीआई या आयकर विभाग जैसी एजेंसियां बिना साक्ष्य के कार्रवाई नहीं करतीं। इन एजेंसियों ने चिदंबरम और लालू प्रसाद जैसी बड़ी शख्सियतों से संबंधित स्थानों पर छापा मारा, तो बेशक उनके पास ऐसा करने का ठोस कारण होगा। यह तर्क निराधार नहीं है। केंद्रीय जांच ब्यूरो ने आईएनएक्स मीडिया प्राइवेट लिमिटेड से जुड़े मामले में चिदंबरम के यहां छापा मारा। 2007 में केंद्र ने इस कंपनी की हिस्सेदारी विदेशी इकाइयों को बेचने की मंजूरी दी थी। इल्जाम है कि उस दौरान भ्रष्टाचार हुआ। आयकर विभाग ने लालू प्रसाद और अन्य व्यक्तियों से संबंधित 1,000 करोड़ रुपए के कथित बेनामी लेनदेन के मामलों में कम-से-कम 22 स्थलों पर तलाशी ली। विपक्ष ने इसे बदले की भावना से उठाया गया कदम और सरकारी एजेंसियों का दुरुपयोग बताया है। मगर अतीत में हुए भ्रष्टाचार को लेकर जन-मानस में इतनी व्यग्रता है कि ऐसी बातों पर लोग ध्यान नहीं देंगे। आमजन की चाहत है कि सत्ता में रहे लोगों से जुड़े मामलों में भी कानून को अपना काम करने की पूरी छूट दी जाए और यही होना भी चाहिए। चिदंबरम या लालू या अन्य नेता खुद के निर्दोष होने को लेकर आश्वस्त हैं, तो उन्हें भारतीय न्याय प्रक्रिया पर भरोसा रखना चाहिए। लेकिन सरकार से भी अपेक्षित है कि वह ऐसी धारणा ना बनने दे कि विपक्ष को इरादतन परेशान किया जा रहा है।


विपक्ष ने मोटे तौर पर तीन दलीलें दी हैं। एक तो उसने समय का सवाल उठाया। कहा कि लोकसभा चुनाव में अपनी विजय की तीसरी सालगिरह पर भाजपा सरकार ने चिदंबरम और लालू को निशाना बनाया, ताकि उसकी कथित विफलताओं से ध्यान हट सके। फिर दो ऐसे नेताओं को चुना गया, जो मोदी सरकार के मुखर विरोधी हैं। ऐसी भी खबरें हैं कि लालू प्रसाद राष्ट्रपति चुनाव से पहले विपक्ष को एकजुट करने में लगे हैं। तीसरा तर्क दिया गया कि व्यापमं, ललित मोदी कांड, छत्तीसगढ़ के पीडीएस जैसे कथित घोटालों की जांच में एजेंसियां सुस्ती बरत रही हैं, जबकि विपक्षी नेताओं के मामलों में अति-उत्साह दिखा रही हैं। चूंकि भारत में सीबीआई जैसी एजेंसियों के राजनीतिक दुरुपयोग का इतिहास पुराना है, अत: ऐसी बातों पर कुछ लोग यकीन करने लगते हैं। इसलिए सरकार को अतिरिक्त प्रयास करने चाहिए ताकि उसकी निष्पक्षता असंदिग्ध रहे। वैसे विपक्षी नेताओं के लिए उचित यही होगा कि वे सियासी प्रचार के बजाय कोर्ट में खुद को निर्दोष साबित करने पर ज्यादा ध्यान दें।

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