संपादकीय : जस्टिस कर्णन की हेकड़ीUpdated: Fri, 17 Mar 2017 06:14 PM (IST)

आरंभ से जस्टिस कर्णन अपने खिलाफ कार्रवाई के लिए न्यायपालिका को ललकार रहे हैं। इस घटनाक्रम पर जल्द से जल्द विराम लगना चाहिए।

कोलकाता हाई कोर्ट के जज जस्टिस सीएस कर्णन मानो भारतीय न्यायपालिका के सब्र का इम्तिहान ले रहे हैं। पहले तो उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के जजों पर ऐसे आरोप लगाए, जिनका कोई साक्ष्य उन्होंने प्रस्तुत नहीं किया। जब इस पर सर्वोच्च न्यायालय ने अवमानना कार्यवाही शुरू की, तो वे उसकी अवहेलना करते रहे। समन पर जब जस्टिस कर्णन पेश नहीं हुए, तो पिछले हफ्ते सुप्रीम कोर्ट ने उनके खिलाफ जमानती वारंट जारी किया। मगर उसका सम्मान करने के बजाय जस्टिस कर्णन अपने भड़काऊ रुख पर कायम हैं। उन्होंने उच्चतम न्यायालय के सात वरिष्ठ जजों से 14 करोड़ रुपए का मुआवजा मांगा है। इल्जाम लगाया कि उन्हें मानसिक रूप से परेशान किया गया। उनकी बेइज्जती की गई। इससे उनके सम्मान को ठेस पहुंची है। इसका दोष उन्होंने उनके मामले की सुनवाई करने वाले जजों पर डाला है।


उल्लेखनीय है कि इसके पहले जस्टिस कर्णन जाति-कार्ड भी खेल चुके हैं। उन्होंने कहा था कि दलित होने के कारण उन्हें सताया जा रहा है। जबकि उनका आचरण लंबे समय से आपत्तिजनक है। मद्रास हाई कोर्ट का जज रहते हुए उन्होंने खुद अपने तबादले पर रोक लगा दी थी। सर्वोच्च न्यायालय के सख्त रुख अपनाने के बाद वे कोलकाता हाई कोर्ट गए। लेकिन वहां से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर उन्होंने नया विवाद खड़ा कर दिया। उसी पत्र को लेकर उनके खिलाफ अवमानना कार्यवाही चलाई जा रही है। उस पत्र में उन्होंने उच्चतर न्यायपालिका के तकरीबन 20 जजों का नाम लेकर उन्हें भ्रष्ट बताया और उनके खिलाफ जांच की मांग की थी। उन्होंने किस आधार पर तोहमत लगाई, ये साफ नहीं है। अगर वे अपने आरोपों को लेकर सचमुच गंभीर थे, तो अपने सबूत न्यायपालिका की अंदरूनी प्रक्रिया के समक्ष रख सकते थे। इसके बजाय उन्होंने सीधे प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर मामले को बहुचर्चित बनाने का प्रयास किया।


स्पष्टत: ऐसी घटनाओं से न्यायपालिका की साख प्रभावित होती है। लोगों के मन में न्यायाधीशों की विश्वसनीयता को लेकर सवाल उठते हैं। ऐसे में उनके खिलाफ अवमानना की कार्यवाही शुरू कर सुप्रीम कोर्ट ने उचित कदम उठाया। अगर न्यायमूर्ति कर्णन के पास सचमुच जजों के खिलाफ कोई साक्ष्य है, तो अवमानना मामले की सुनवाई के दौरान उसे वे पेश कर सकते थे। आखिर ऐसे मामलों में सच को पर्याप्त बचाव माना जाता है। यानी आरोपी यह दिखा दे कि सत्य उसके साथ है, तो वह बरी हो सकता है। मगर जस्टिस कर्णन ऐसे वैध एवं न्यायिक तरीकों को नहीं अपनाते। वे विवाद खड़ा करने में यकीन करते हैं। इसी क्रम में अब उन्होंने जजों से क्षतिपूर्ति मांगी है। मगर मुमकिन है कि इससे सुप्रीम कोर्ट का रुख और सख्त हो। दरअसल आरंभ से जस्टिस कर्णन अपने खिलाफ कार्रवाई के लिए न्यायपालिका को ललकार रहे हैं। इससे विवाद बढ़ रहा है। न्यायपालिका को लेकर अवांछित चर्चाएं हो रही हैं। इस पर तुरंत विराम लगना चाहिए।

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