आलेख : विचारधाराओं में हिंसक टकराव - संजय गुप्तUpdated: Sun, 10 Sep 2017 10:37 PM (IST)

राजनेताओं की जिम्मेदारी है कि देश में ऐसा माहौल कायम करें, जिसमें हर विचारधारा वाला व्यक्ति खुद को सुरक्षित महसूस करे।

कर्नाटक में वामपंथी विचारधारा वाली पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या की सिर्फ और सिर्फ भर्त्सना ही की जा सकती है। देश के दूसरे हिस्सों, खासकर उत्तर भारत में गौरी लंकेश का नाम उतना मशहूर नहीं था, लेकिन एक प्रतिबद्ध पत्रकार और साथ ही सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में कर्नाटक में उनकी खासी ख्याति थी। वे 'गौरी लंकेश पत्रिका" का संपादन करने के साथ ही समाजसेवा के क्षेत्र में भी सक्रिय थीं और उनका सबसे बड़ा काम नक्सलियों को मुख्यधारा में शामिल करने का था। पूरा मीडिया जगत उनकी हत्या से स्तब्ध है। अपनी धारदार लेखनी के जरिए वह दक्षिणपंथी विचारधारा के खिलाफ आवाज उठाया करती थीं। वह भाजपा, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और अन्य हिंदूवादी संगठनों की प्रबल आलोचक थीं। ऐसे सभी संगठन हमेशा उनके निशाने पर रहते थे।


गौरी लंकेश के पहले उन्हीं के जैसे विचारों वाले एमएम कलबुर्गी की भी कर्नाटक में ही हत्या कर दी गई थी। अभी भी कर्नाटक पुलिस कलबुर्गी के हत्यारों तक नहीं पहुंच सकी है। चूंकि इन दोनों घटनाओं में काफी समानता है, इसलिए कई राजनीतिक दल और मीडिया का एक हिस्सा दक्षिणपंथी विचारधारा वाले संगठनों को दोषी ठहरा रहा है। इस कड़ी में महाराष्ट्र में मारे गए गोविंद पनसारे और नरेंद्र दाभोलकर का भी नाम लिया जा रहा है।


कर्नाटक सरकार ने गौरी लंकेश की हत्या की जांच की जिम्मेदारी एक विशेष टीम को सौंपी है। लेकिन यह आश्चर्यजनक है कि गौरी लंकेश की हत्या का कारण सामने आने के पहले ही पूरे मामले को राजनीतिक रंग दे दिया गया। कांग्रेस और वाम दलों समेत अन्य कई राजनीतिक दलों व संगठनों ने आरोप लगाया है कि गौरी की आवाज को दबाने लिए उन लोगों ने उनकी हत्या की, जो उनके लेखन और विचारों को पसंद नहीं करते थे। उनका स्पष्ट संकेत भाजपा, संघ आदि की ओर है। इसके जवाब में भाजपा कर्नाटक की कांग्रेस सरकार को कठघरे में खड़ा करते हुए कह रही है कि जब उसे पता था कि गौरी लंकेश को धमकियां मिल रही हैं तो उसने उन्हें पर्याप्त सुरक्षा मुहैया क्यों नहीं कराई? इस आरोप-प्रत्यारोप के बीच यह सवाल गुम है कि आखिर कर्नाटक सरकार अब तक कलबुर्गी के हत्यारों तक क्यों नहीं पहुंच सकी? कर्नाटक सरकार के ढुलमुल रवैये से यह भी संदेह उभरा है कि कहीं वह गौरी लंकेश की हत्या को राजनीतिक रूप से भुनाना तो नहीं चाहती?


गौरी लंकेश की हत्या एक तरह से एक राजनीतिक हत्या है। शायद उन्हें इसलिए निशाना बनाया गया, क्योंकि कुछ लोगों को उनके विचार और कार्य रास नहीं आ रहे थे। सीधे तौर पर देखा जाए तो यह संविधान के तहत मिली अभिव्यक्ति की आजादी की हत्या है। जब हम अपने आपको विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र मानते हैं, तब इस तरह की हत्या हमारे समाज और राजनीति पर गहरे दाग लगाती है।


दुर्भाग्य से हमारे देश में रह-रहकर ऐसी हत्याएं होती ही रहती हैं। सच तो यह है कि ये सिलसिला महात्मा गांधी की हत्या से ही शुरू हो गया था। राजनेताओं के अलावा सामाजिक कार्यकर्ता भी इसी प्रकार की वैचारिक दुश्मनी के शिकार होते आए हैं। गौरी लंकेश की हत्या के मामले में विपक्ष के आरोपों का जवाब देते हुए केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने केरल में संघ कार्यकर्ताओं की हत्याओं पर कांग्रेस और वामपंथी दलों समेत दूसरे तमाम संगठनों की चुप्पी पर सवाल खड़ा किया है। यह सवाल सही है, लेकिन क्या राजनीतिक दलों द्वारा एक-दूसरे को आईना दिखाने भर से ही इस समस्या का समाधान हो जाएगा?


राजनीति, समाजसेवा व अन्य अनेक क्षेत्रों में समाज के उत्थान के लिए जो लोग भी काम करते हैं, उनकी अपनी-अपनी विचारधारा होती है। इनमें से कुछ लोग अपनी विचारधारा से इतना अधिक जुड़ जाते हैं कि वे यह भूल जाते हैं कि लोकतांत्रिक मूल्यों के दायरे में आने वाली हर विचारधारा का आदर होना चाहिए। अपनी सोच पर कायम रहते हुए विरोधी विचारधारा के प्रति जब घृणा का भाव मन में आने लगता है तो टकराव की स्थिति बनने लगती है। कभी-कभी यह टकराव हिंसा और हत्याओं को जन्म देता है।


इधर परस्पर विरोधी विचारधारा वाले लोगों के बीच टकराव इसलिए और अधिक बढ़ा है, क्योंकि सोशल मीडिया के प्रसार के साथ सूचना और विचारों का प्रवाह भी तेज हो गया है। पहले राजनेता और सामाजिक कार्यकर्ता जब अपनी बात कहते थे तो वह एक सीमित दायरे में ही रहती थी, लेकिन आज स्थिति एकदम भिन्न् है।


वर्तमान में सोशल मीडिया पर मौजूद किसी भी व्यक्ति को यह सुविधा है कि वह पूरे विश्व में अपनी बात या विचारों को फैला सके और दुनिया भर के लोगों से जुड़ सके। कई बार किसी मसले पर लोगों की प्रतिक्रिया अत्यधिक अशिष्ट और उत्तेजित करने वाली होती है। चूंकि सोशल मीडिया पर करीब-करीब हर बड़ा नेता और सामाजिक कार्यकर्ता मौजूद है, इसलिए लोग यह भी अपेक्षा करने लगे हैं कि प्रत्येक मसले पर उनकी टिप्पणी आए। जब ऐसा नहीं होता तो उसके मनमाने मतलब निकाल लिए जाते हैं। इस पर हैरत नहीं कि कुछ लोग गौरी लंकेश की हत्या पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चुप्पी पर सवाल खड़ा कर रहे हैं। क्या ऐसे लोग यह भी चाहते हैं कि प्रधानमंत्री केरल में होने वाली राजनीतिक हत्याओं पर भी बोलें?


एक सवाल यह भी उठ रहा है कि प्रधानमंत्री टि्वटर पर ऐसे लोगों को क्यों फॉलो कर रहे हैं, जो गौरी लंकेश की हत्या को जायज ठहरा रहे हैं? आखिर यह सवाल केवल प्रधानमंत्री के मामले में ही क्यों उठ रहा है, क्योंकि सोशल मीडिया पर तो हर सियासी दल के वैसे ही समर्थक हैं जैसे कि भारतीय जनता पार्टी के हैं? विचारों की अभिव्यक्ति के नाम पर गाली-गलौज और नफरत का प्रदर्शन सोशल मीडिया की एक ऐसी खामी है, जिसे दूर किया जाना अनिवार्य हो गया है।


पहले जब सोशल मीडिया नहीं था तो टीवी या समाचार पत्र के जरिए ही लोगों को पता लगता था कि किसी मामले में किसी राजनेता का क्या कहना है, लेकिन आज टि्वटर और फेसबुक प्रतिक्रिया जानने का सबसे बड़ा स्रोत बन गए हैं। हर मामले में राजनेता की प्रतिक्रिया जानने की अपेक्षा अनुचित है। एक तो हर मामले में प्रतिक्रिया देना आवश्यक नहीं और दूसरे, नेता यह भी ध्यान रखते हैं कि कौन-सा प्रकरण राजनीतिक रूप से उनके अनुकूल है और कौन-सा नहीं?


चूंकि देश में वैचारिक विभाजन बढ़ता ही जा रहा है, इसलिए राजनीतिक हिंसा और हत्याओं का सिलसिला बंद होने के आसार कम ही हैं। राजनेता इस सवाल से बच नहीं सकते कि वे समाज को सही दिशा क्यों नहीं दे पा रहे हैं? हर किसी को वैचारिक स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। यह राजनेताओं की जिम्मेदारी है कि देश में ऐसा माहौल कायम हो, जिसमें प्रत्येक विचारधारा वाला व्यक्ति या सामाजिक कार्यकर्ता खुद को सुरक्षित महसूस करे और उसका आदर हो। विचारधारा आधारित राजनीति आवश्यक है, लेकिन यह हिंसा और हत्या के रूप में नहीं होनी चाहिए। यह भी सभी को ध्यान रखना होगा कि विचारों का खुलापन ही समाज को आगे ले जाता है और इस खुलेपन का आधार एक-दूसरे के विचारों के प्रति आदर भाव ही हो सकता है।


(लेखक दैनिक जागरण समूह के सीईओ व प्रधान संपादक हैं)

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